गुरुवार, 17 नवंबर 2016

dashhara akhodekha - v.k. mehra

                                व्यंग्य-दशहरा आॅखो देखा 

                                व्यंग्य-दशहरा आॅखो देखा

    आज दशहरा है और हमारा बच्चा दशहरा (रावण) देखने के लिए लालायित था। हम उसे रावण दिखाने ले गए। वहाॅ देखा तेा 30-40 पुलिस वाले रावण के पुतले की रक्षा कर रहे थे।
बालक ने हमसे पूछा- पापा रावण तो बुरा होता है तो फिर रावण की रक्षा मे पुलिस क्यों लगी है ?
हमने कहा - बेटा, पुलिस रावण की सेफटी के लिए है, कही कोई आसामाजिक तत्व रावण को नुकसान न पहुॅचा दें।
    इतने मे रावण को बनाने वाला शख्स हमारे सामने आ गया किसी ने उससे पूछा - भैया इस साल का रावण तो बहुत छोटा बनाया है ?
वो बोला - इसे बनाने में ही हम दस आदमी तीन दिनों से लगातार मेहनत कर रहे हैं और इसे बनाने में लगभग पचास हजार रूपये का खर्चा आया है। वो बडे गर्व से बता रहा था, एक रावण को अपने पैरों पर खडा करने मे कितना मानव श्रम लगा और कितनी लागत आई।
बालक पूछ बैठा- पापा रावण को बनाने मे इतना खर्चा क्यों किया गया ?
मै कुछ नही बोल सका। इतने में राम, लक्ष्मण हाथ मे धनुष बाण लिए प्रांगण मे आ गए, राम ने धनुष बाण निकाला और रावण से बोले - तेरा क्या होगा रावण, तुझे तो मै जलाकर राख कर दूॅगा।
अचानक रावण भी बोल उठा - हा, हा, हा जाओ, पहले उस आदमी को जलाकर आओ जिसने माॅ, बहन की इज्जत पे हाथ डाला, जाओ पहले उस आदमी को जलाकर आओ जिसने गरीबो का खून चूसा, जाओ पहले उस आदमी को जलाकर आओ जिसने खूब भ्रष्टाचार किया, उसके बाद तुम जैसे चाहो वैसे मुझे जला सकते हो, मार सकते हो।
    जिसने भ्रष्टाचार किया वो तो हममे से एक है जिसने गरीबो का खून चूसा, वो भी हमसे एक है और जिसने माॅ-बहन की इज्जत पर गलत नजर डाली वो तो हमारे गुरू रहे है वो भी हमसे से एक है, पर रावण, तुम हममें से एक नही हो, तुम्हें तो मरना ही होगा।
    रावण बोला- अगर तुम इन लोगो को पहले जलाकर नही आते तो मै तुम सभी लोगो को शाप देता हूॅ कि हर वर्ष मुझे बनाना होगा और जबरदस्ती मुझे जलाया जाएगा।
    राम ने आग लगा बाण छोडा और रावण मे आग लग गयी।
    रावण धमाके की आवाज के साथ जल उठा। जोर जोर से पटाखो के धमाको की आवाज आने लगी।
    तभी हमारा बेटा हमसे बोला- पापा रावण कितनी जोर जोर से हॅस रहा है।
                               

                                                                                              विजय कुमार मेहरा द्वारा संजय सिरवैया
                                                                                                  लक्ष्मी टाकीज के पास टीकमगढ़
                                                                                                                        म0 प्र0

bundelkhand ki meerabai

बुन्देलखण्ड की मीराबाई: महारानी कमलकुंवरि ‘जुगल प्रिया’

-अभिनंदन गोइल

        छतरपुर नरेश महाराजा विश्वनाथ सिंह जी (सन् 1867-1932) की ज्येष्ठ महारानी श्रीमती कमलकुमारी देवी उर्फ कमल कुँवरि ओरछेश महाराजा  प्रताप सिंह जू देव (1874-1930) जो धर्मक्षेत्र में योगिराज महर्षि के नाम से जाने जाते थे की सुपुत्रीं थीं। कमल कुँवरि की साध्वी स्वरूप माता महारानी वृषभान कुँवरि थी, जिनकी प्रेरणा से ही अयोध्या में कनक भवन और नेपाल के जनकपुर में श्री राम-जानकी मंदिर का निर्माण कराया गया था। सुसंस्कार, त्याग और तप की दीक्षा कमल कुँवरि को अपने धर्म परायण माता-पिता से ही प्राप्त हुई थी।

        प्रसिद्ध मनीषि और साहित्यकार श्री वियोगी हरि जी श्रीमती कमल कुमारी देवी को अपनी धर्म माता मानते थे। उन्होंने स्वीकारा है कि ‘‘उनके (कमल कुँवरि के) पवित्र वात्सल्य ने ही जीवन के अंधेरे मरू-देश में भटक जाने से मुझे बचाया था।’’.....................’’ पति के साथ उनका सांसारिक सम्बंध नहीं बना। जीवन भर विरागनी ही रहीं। सत्संग, धर्मग्रन्थों का पारायण ही जीवन क्रम रहा। सत्संग करते-करते धर्मतत्व का खासा ज्ञान भी इन्हें हो गया था। सैकड़ों श्लोक और पद कण्ठाग्र थे। चारों बैष्णव संप्रदायों से तो निकट का सम्बंध था ही, शैव सम्प्रदाय का भी अच्छा ज्ञान था। राम, कृष्ण और शिव तीनों ही उनके उपास्य देव थे।’’

        महारानी कमल कुमारी का जीवनक्रम तपस्यामय था। बड़ी दृढ़ता के साथ वे दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिन के कठिन उपवास करती थीं। बीमार होने पर भी कभी उन्होंने अपने व्रतों को खण्डित नहीं किया। सत्संग, शास्त्रों का पठन-पाठन उपवास के दिनों में भी ज्यों का त्यों चलता रहा। जिस प्रकार मीराबाई की तपःसाधना में विघ्न-बाधायें आई उसी तरह महारानी कमलकुमारी जी की साधना में भी आई और उन्होंने बड़ी बड़ी यंत्रणायें भी झेली परन्तु सभी क्लेशों को हंसते-हंसते सहन किया। मीराबाई की ही भांति इनकी भी धर्मश्रद्धा पीड़ायें सहकर और अधिक उज्जवल होती गईं।

        श्री वियोनी हरि ने अपनी इन धर्ममाता के साथ अनेक तीर्थ यात्रायें की थीं। जिनकी बड़े ही भावनात्मक और मार्मिक संस्मरण उनके आलेख ‘‘एक पुण्य कथा’’ में वर्णित है। इसी संदर्भ से एक मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूँ।
    वे ब्रह्म गिरि की कठिन यात्रा पर गईं। महारानी होने के बाबजूद भी वे रेल के तीसरे दर्जे में ही यात्रा करती थी, और पैदल भी खूब चलती थी। जेठ का महीना था। पर्वत की शिलायें मानो आग उगल रहीं थीं। उनका एकादशी का निर्जला व्रत था। पूजा-पाठ से निवृत हो वे दोपहर 12 बजे नंगे पैर पर्वत की प्रदक्षिणा के लिये चल दी। वृद्धा नौकरानी ने भी अनुकरण किया पर थोड़ी दूर पर ही उसके पैरों ने जबाब दे दिया। करुणामयी कमल कुँवरि ने अपनी साड़ी की धज्जियाँ फाड़ चीरकर नौकरानी के पैरों पर लपेट दी और स्वयं नंगे पैरों ही पवित्र ब्रह्म गिरि की ढाई कोस की प्रदक्षिणा उस तपती दोपहर में राम-राम जपते हुये, बिना विश्राम किये पूरी की।

    नाथ द्वारा की यात्रा में बुखार पीड़ित अचेत नौकरानी के पैर दवाकर सेवा की। नौकरानी बेचारी को कुछ भी पता नहीं चलने दिया। आश्चर्यचकित वियोगी हरि से धीरे से बोलीं- ‘‘बेटा, यह कोई बड़ी बात नहीं है। इस गरीबनी ने तो मेरी बरसों सेवा की है। यह बुढ़िया तो मेरी माँ समान है। मंदिर मैं आज इसलिये नहीं गई कि सेवा का यह पुण्यफल वहाँ कहाँ मिलता। यह भी तो श्रीनाथ जी की ही आराधना है।’’

        लगता है उनके हृदय की करूणा ही विगलित होकर उनके काव्य में ढल गई हो। ‘‘जुगल प्रिया’’ उपनाम से उन्होंने बृजभाषा में बहुत ही सुन्दर पद रचे थे, जिनका संग्रह श्री वियोगी हरि ने ‘‘जुगलप्रिया-पदावली’’ के नाम से प्रकाशित कराया था। उसका एक पद यहाँ उद्धत है-
                    नाथ अनाथन की सब जानें।
                ठाड़ी द्वार पुकार करत हों,
                    स्रवन सुनत नहिं, कहा रिसानै ?
                की वहु खोटि जान जिय मेरी,
                    की कछु स्वारथ हित अरगानै ?
                दीनबन्धु मनसा के दाता-
                    गुन औगुन कैधों मन आने ?
                आप एक हम पतित अनेकन,
                    यही देखि का मन सकुचानै ?
                झूठोहि अपनौ नाम धरायौ,
                    समझि रहे हैं ‘‘हमहिं सयानै’’
                तजो टेक मन मोहन मेरे,
                    ‘‘जुगलप्रिया’’ दीजै रस दानै।
        श्री रामनरेश त्रिपाठी ने रानी कमलकुँवरि कृत पद्य वद्ध ‘‘तुलसी दास का जीवन चरित्र’’’ प्रकाशित किया था, जो अब अप्राप्त है।

        मीराबाई से साम्य स्थापित करने वाला  उनका एक पद प्रस्तुत है-
            धरी राजसी दूरि भक्ति रस रंग विकासिनी।
            करि कठोर पत रमति तीरथनि तेज प्रकाशनी।।
            चढ़ि खांडे की धार विमुख जन गति मति लोपी।
            संतन हरि अधिक मानि वैष्णव ध्वज रोपी।।
            श्री ब्रज राजेश्वरी कृपा बल श्रुति दुर्लभ आनंद पगी।
            ‘जुगल प्रिया’ मीरा सदृश युगलरूप रूचि रस संगी।

        अंत में श्री वियोगी हरि जी के शब्दों से ही अपनी बात का उपसंहार करता हूँ-
        ‘‘मेरी धर्ममाता की साधना, सत्यनिष्ठा, सेवा-परायणता और भक्ति भावना इतनी ऊँची थी कि उनकी गणना निःसन्देह पुराकाल के भागवतों में की जा सकती है। मैंने तो उन्हें मीराबाई का अवतार माना और ऐसा करके मैंने कोई अत्युक्ति नहीं की।’’

संदर्भ ग्रंथ-
1. ओरछेश स्मृतिग्रन्थ, स्व.श्री बनारसीदास चतुर्वेदी
2. बुन्देलखण्ड की कवियात्रियाँ, स्व.श्री हरिविष्णु अवस्थी

                                 अभिनंदन गोइल
                                    अध्यक्ष
                            अखिल भारतीय बुन्देलखण्ड साहित्य
                                  एवं संस्कृति परिषद्
                               जिला इकाई टीकमगढ़ (म.प्र.)
                                   मोबा. 9424923622
bundelkhand ki mirabai

nepal yatra - ramgopal rekwar

 चल-चल रे काठमाण्डू ......... मिलेंगे वहाँ षंभू (नेपाल यात्रा)
                                        -रामगोपाल रायकवारं

आमंत्रण- अखिल भारतीय बुन्देलखंड साहित्य एवं संस्कृति परिषद, भोपाल म.प्र. के तत्वावधान में काठमाण्डू (नेपाल) में 01-03 नवम्बर 2014 तक आयोजित होनेवाले प्रथम अन्तरराष्ट्रीय बुन्देली भाषा सम्मेलन में भाग लेने का आमंत्रण श्री पूरनचंद्र जी गुप्ता द्वारा मिला था।  सम्मेलन में भाग लेने हेतु निर्धारित चार विषयों में से न्यूनतम एक और अधिकतम दो षोध आलेख भेजे जाने आवष्यक थे। मेरी स्वीकृति के पष्चात उन्होंने अपने साथ ही मेरा भी रिजर्वेषन बरौनी मेल में करा लिया। यथासमय एक आलेख, जीवन परिचय और फोटो भेज भी दिए। दूसरा अधूरा आलेख आज भी पूरा होने की प्रतीक्षा कर रहा है। बुन्देली से जुड़ा होने के कारण ऐसे बड़े आयोजन में सम्मिलित होने की इच्छा स्वाभाविक थी पर सबसे बड़ी लालसा थी भगवान पषुपतिनाथ जी के दर्षनों की। विदेष यात्रा का ठप्पा तो लगना ही था। अड़चन एक ही थी, नवम्बर में संभावित नगरीय चुनाव की तिथियाँ और चुनाव ड्यूटी। डर था कि कहीं इसी बीच चुनाव प्रषिक्षण न हों। पर मन पषुपतिनाथ जी के दर्षनों के लिए संकल्पित था, जो होगा सो देखा जाएगा।
प्रस्थान- 29.10.2014 भोपाल से झाँसी आकर दोपहर बाद गोरखपुर जाने के लिए ट्रेन के समय तक प्रतीक्षा करने के सिवा कोई खास काम न था। आवष्यक तैयारी भोपाल जाने के पूर्व ही की जा चुकी थी क्यांेकि इस बीच डी.एल.एड. पाठ्यक्रम सामग्री निर्माण कार्यषाला हेतु भोपाल जाना पड़ा था। सुबह जब अपने सहयात्री श्री पूरनचंद्र जी गुप्ता को फोन लगाकर अपना सीट और कोच नंबर जानना चाहा तो बजाय कोच नंबर बताने के उन्होंने यह कहकर होष उड़ा दिए कि यात्रा के टिकट खो गए हैं। यह भी बताया कि उनकी फोटोकाॅपी उनके पास है उससे काम चल जाएगा। इस पर मैंने उन्हें टोका कि मेन्यूल टिकट की फोटोकाॅपी मान्य नहीं होती अतः वे तत्काल काउण्टर पर जाकर डुप्लीकेट टिकट बनवालें। खैर, थोड़ी बहस करने के बाद वे डुप्लीकेट टिकट बनवाने के लिए तैयार हो गए। गुप्ता जी ने कुछ देर बाद काउण्टर से बताया कि सभी के आई.डी. प्रूफ की आवष्यकता है अतः वे घर जा रहे हैं। कुछ समय बाद फोन लगाया तो पता चला कि टिकट मिल गए हैं। चैन की साँस ली और ईष्वर को धन्यवाद दिया कि व्यर्थ में लगनेवाला पैसा (टिकट की राषि का पचास प्रतिषत) बचा। हाँ, इस बीच कई बार फोन करने के बाद भी कोच और सीट नंबर पता नहीं चला सो नहीं चला। अब उनके झाँसी आने का इंतजार करना ही ठीक रहेगा।
      दोपहर, 12ः45। ससुराल में खाना खाकर और श्रीमती जी से, जो कि दो-तीन दिन पहले ही आकर मायके की षोभा बढ़ा रहीं थीं, से बिदा लेकर स्टेषन के लिए रवाना हुआ। गुप्ता जी को फोन लगाकर उनकी स्थिति पता की तो उन्होंने बताया कि वे झाँसी पहुँच गए हैं और थोड़े समय में ही स्टेषन पहुँनेचाले हैं। मैं अभी रास्ते में ही था कि श्री महेष जी बादल का फोन आया कि कुछ मूली-टमाटर वगैरह लेता आऊँ। बादल जी हम लोगों के साथ जानेवाले दल के सदस्य थे, मेरे बहुत ही पुराने परिचित। युग निर्माण योजना के वरिष्ठ कार्यकर्ता। मूली-टमाटर खरीदने के चक्कर में कुछ समय लगा। चिंता हुई कि कहीं लेट न हो जाऊँ पर ट्रेन के समय से पहले ही पहुँच गया। ट्रेन रेलवे के अनुसार कथित रूप से सही समय पर थी पर गुप्ता जी का कहीं कोई अता-पता न था। पाँच बार फोन पर पूरी घंटी बजी पर उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। हल्की-सी झुँझलाहट के साथ उनके एक बार अंदाज से बताए गए 9 नंबर कोच के रुकने की संभावित जगह के सामने खड़ा हो गया। डिसप्ले बोर्ड पर सही समय बताने के बावजूद ट्रेन बीस मिनट देर से आई। हिन्दी के मिश्र वाक्य अंतर्गत क्रिया विषेषण उपवाक्य के प्रसिद्ध उदाहरण ‘ जैसे ही मैं प्लेटफार्म पर पहुँचा ट्रेन चल दी’ के विपरीत ‘जैसे ही ट्रेन प्लेटफार्म पर रुकी वैसे ही गुप्ता जी आ गए।’ सपत्नीक थे। उनका बड़ा लड़का छोड़ने आया था। कोच का सही नंबर 10 था। गुप्ता जी के अंदाज के बेहद करीब इसलिए परेषानी नहीं हुई। फोन रिसीव न करने पहला कारण यह बताया कि कल ही नया फोन लिया है जिसकी नई रिंग टोन अभी अच्छी तरह याद नहीं है, दूसरे षोर की वजह से भी षायद घंटी सुनाई नहीं दी होगी। छोड़नेवालों की अनावष्यक भीड़ और उनकी आवष्यक एवं अनावष्यक हिदायतों के कारण हमारे यहाँ स्टेषनों पर षोर ज्यादा ही होता है।
डिब्बे में चढ़कर अपनी-अपनी सीटों पर जाकर बैठ गए। ट्रेन चलने से पहले ही बादल जी आ गए। वे 5 नंबर कोच में थे, उन्होंने बताया कि रमेष जी षर्मा एवं  संगीतकार और आकाषवाणी कलाकार श्री सत्यनारायण तिवारी सपत्नीक अगल-बगल के कोच में हैं। मैं उनसे मिल आऊँ पर मेरा ऐसा कोई भी नेक इरादा नहीं था सो मैंने उनके द्वारा मँगाए मूली-टमाटरों में से कुछ अपने और गुप्ता दम्पत्ति के लिए बचाकर बाँकी उन्हें सौपे और अनधिकृत यात्रियों से घिरती जा रही अपनी षेष कथित आरक्षित सीट को बचाने के लिए आड़ा हो गया। मेरे इस वैध किन्तु स्वार्थमय कार्य को घुसपैठिए यात्रियों ने बड़ी भत्र्सना की दृष्टि से देखा। मैंने बादल जी को भी सलाह दी कि वे अपनी सीट पर ही जाकर बैठें अन्यथा टी.टी.ई. आपके न मिलने पर नियमानुसार किसी दूसरे को सीट दे देगा। बादल जी ने मेरी इस बहुमूल्य राय को बड़े हल्के में लिया पर आखिरकार वे अपने कोच में चले गए। इस बीच श्री सत्यनारायण तिवारी भी आ गए और दो-चार क्षण रुककर ही वापिस लौट गए। ट्रेन कहने को ही एक्सप्रेस थी वरना यह हाल था कि अभी तक एकाध स्टेषन को छोड़ सभी स्टेषनों पर रुक चुकी थी पर अभी टी.टी.ई. का पता नहीं था। भीड़ जरा भी कम नहीं हुई थी। उरई आ गया था। जैसे ही मेरी सीट पर बैठे या जमे महाषय उठे वैसे ही मैंने अपनी चादर (सीट) के मुताबिक पैर फैला लिए। कानपुर आते-आते गुप्ता दम्पत्ति को भूख सताने लगी थी सो उनका साथ देने के लिए मैंने भी अपनी पूरियाँ और आलू की सूखी सब्जी निकाली और परस्पर आदान-प्रदान कर खाने लगा। चूँकि रात को दो बजे गोरखपुर पहुँचना था इसलिए जल्दी सो जाना ही ठीक था। सोने के पहले एक चक्कर बादल जी के कोच का लगाना जरूरी था। 8 नंबर कोच में रमेष जी बाकायदा खर्राटे लेते हुए मिले, उन्हें जगाना ठीक नहीं  समझा। बादल जी अपनी सीट पर उसके खाली होने के इंतजार में बैठे थे। उनसे लम्बी बातचीत हुई। नगरीय चुनावों से लेकर पंचायत चुनावों की कठिनाइयों तक। मेरी स्मृति में पंचायत चुनावों से जुड़े कई रोचक प्रसंग सुरक्षित थे, उन्हें सुनाने में काफी समय कट गया।  वे जल्दी सोने और जल्दी जागनेवाले व्यक्तियों में से एक हैं इसलिए सीट खाली होने की प्रतीक्षा उनके लिए किसी तपस्या से कम न थी। मैंने मन-ही-मन ईष्वर से उनकी षैया मुक्ति हेतु प्रार्थना की (जो षायद लखनऊ में कुबूल हुई थी) और लौट आया। लौटकर मोबाइल फोन में डेढ़ बजे का अलार्म सेट किया और कुछ देर करवटें बदलकर सो ही गया। कम-से-कम ‘करवटें बदलते रहे सारी रात हम, आपकी कसम’ जैसी नौबत नहीं आई। ठंड बिल्कुल ही नहीं थी और पंखे की हवा अच्छी लग रही थी।
30.10.2014: मोबाइल का अलार्म बजने पर नींद खुली। कुछ प्रतीक्षा और बाहर निकला थोड़ा -सा सामान बैग में रखते-रखते गोरखपुर आ गया। षहर की लगभग सुनसान बस्तियों को चीरते हुए ट्रेन स्टेषन की ओर बढ़ी जा रही थी। उतर न पाने की अनावष्यक आषंका मन में पाले बहुत-से बेसब्र यात्री आदतन दरवाजे पर काफी समय पहले ही खड़े हो गए थे। जबकि ट्रेन प्लेटफार्म पर देर तक खड़ी रहना थी। ट्रेन समय पर थी। प्लेटफार्म पर रुकते ही लोग उतरने लगे उन्हीं के बीच फँसकर हम भी बिना प्रयास के नीचे उतर गए। हमें सिर्फ दरवाजे पर थोड़ा संतुलन भर बनाना पड़ा ताकि गिर न पड़ें। हमारा सात सदस्यीय दल एक जगह इकठ्ठा हो गया। बादल जी हमारे यात्रा एजेण्ट को फोन कर चुके थे। उसी के निर्देषानुसार हम स्टेषन से बाहर आए। हमे सड़क पार करके ‘इमामचैक’ या चबूतरे के पास  ट्रेवल्स के कार्यालय पहुँचना था। कुछ ही क्षण उपरांत एजेण्ट भी आ गया और हमें एक होटल में रुकवा दिया। तीन कमरे थे। एक कमरे में बादल जी, रमेष जी और मैं था। हमारे पास आराम करने और तैयार होने के लिए सात बजे तक का समय था क्योंकि इन्हीे कमरों में सुबह आ रहे षेष आठ सदस्यीय दल को तैयार होना था। बादल जी के जागने और नित्यक्रियाओं से निपटकर पूजा-उपासना का समय हो ही गया था सो वे सीधे बाथरूम में चले गए। मैं और रमेष जी थोड़ा आराम करने के लिए बिस्तर की षरण में  पहुँच गए। बादल जी के बाद क्रमषः मैं और रमेष जी नहा-धोकर तैयार हो गए।
 लगभग छह बजे हम तीनों घूमने निकले और रेललाइन के किनारेवाली सड़क पर चल पड़े। छठपूजा का अंतिम दिन था। उत्तरप्रदेष के पूर्वांचल और बिहार आदि में छठपूजा का विषेष चलन है। महिलाएँ भोर से ही सूर्य भगवान को अघ्र्य आदि दे रहीं थीं। एक छोटे-से मंदिर में छठपूजा हो रही थी। बादलजी और रमेष जी में पैदल चलने की होड़ लग गई थी। मैंने एक-डेढ़ कि.मी. जाने के बाद अकेले ही लौटने का फैसला किया। वे दोनों आगे बढ़ गए। उनका लक्ष्य एक तालाब था जिसकी जानकारी एक रिक्षेवाले ने दी थी और जहाँ छठपूजा का मेला भरा था। मैं लौटा तब तक गुप्ता जी भी तैयार होकर बाहर आ गए थे। हम दोनों ने एक स्वल्पाहार गृह में चाय पी, मैंने तले चनों और गुप्ता जी ने गरमा-गरम जलेबियों का नाष्ता किया। गुड़ खाएँ गुलगुलों से परहेज की मसल की तरह मैंने षुगर होने के कारण बिना षक्कर की चाय भले पी थी पर एक-दो जलेबियाँ खाने से चूका नहीं। कुषीनगर एक्सप्रेस लेट हो गई थी। तभी बादलजी और रमेष जी एक रिक्षे से आते दिखे। इतनी दूर पैदल चलने से रमेष जी के सारे कसबल ढीले पड़ गए थे। इसलिए रिक्षे पर लौटना पड़ा था। मैंने चाय-नाष्ता कर लेने का सलाह दी और इस सलाह के फलस्वरूप पूरी-सब्जी का नाष्ता उन्हीं के सौजन्य से किया। थोड़े विलम्ब के बाद श्री आर.एस. षर्मा दल-बल सहित आ गए। उनके साथ श्रीमती मनोरमा षर्मा, डाॅ. दुर्गेष दीक्षित, श्रीमती मनीषा पुरोहित (दीक्षित जी की पुत्रवधू) श्री दीनदयाल तिवारी,  श्रीमती सुषीला तिवारी, श्री अभिनंदन गोइल, श्रीमती पुष्पा खरे एवं बानपुर के श्री दुबे जी थे। ये सब तैयार होने में जुट गए। श्री और श्रीमती षर्मा पहले भी नेपाल आ चुके थे और अखिल भारतीय बुन्देलखंड साहित्य एवं संस्कृति परिषद, टीकमगढ़ म.प्र. के सचिव भी थे इसलिए षर्मा दम्पत्ति ही हमारे दलनायक और यात्रा प्रबंधक थे। षर्मा जी ट्रेवल्स के मालिक से यात्रा संबंधी बातचीत कर रहे थे, सारा मामला तय हो गया। बहत्तर हजार में बात पक्की हो गई जिसमें लुम्बिनी, जनकपुर, काठमाण्डू एवं मनोकामना देवी के दर्षन तथा आयोजन के दो दिवस छोड़कर लौटने तक होटल की सुविधा सम्मिलित थी। षर्मा जी ने 16 व्यक्तियों के हिसाब से प्रति यात्री 4500 रुपए बस के खर्च की सूचना सबको दे दी। इस सूचना की गूँज  अभी थमी भी न थी कि प्रथम ग्रासे मच्छिका की भाँति विघ्न पड़ गया। हुआ यह कि षर्मा जी ने बानपुर वाले दुबे जी को भी बस में साथ जानेवालों में षुमार कर लिया था पर वे अपना बैग उठाए सड़क के उस पार जाते दिखाई दिए और मैं उन्हें बस में आने के लिए पुकारता ही रह गया। उनके इस अप्रत्याषित एकाकी गमन से हम सब हतप्रभ रह गए। साथ ही इसका  दुष्परिणाम यह हुआ कि एक ही झटके में हमारे किराए में प्रति यात्री 300 रुपए बढ़ गए क्योंकि अब केवल 15 सदस्य ही बचे थे। तीन सहभागियों ने पहले ही आने से मना कर दिया था। बस में बैठ चुके लोगों से यह राषि एकत्रित भी की जाने लगी थी क्योंकि बस मालिक को साठ हजार रुपए एडवांस चुकाने थे। इस वजह से भी दुबे जी का जाना सबको नागवार लगा। खासतौर पर षर्मा जी को जिन्हें कुछ सहयात्रियों को इस किराया वृद्धि का साधारण गणित समझाने में असाधारण समय लगा। यहाँ तक कि बाद में यह बढ़ी हुई राषि एक-दो लोगों से हल्के-से मनमुटाव का कारण भी बन गई। जबकि इसमें षर्मा जी की कोई गलती नहीं थी। इस झमेले में भी काफी समय लग गया।
सब लोगों के बस में बैठते-बैठते और रवाना होते-होते 10 बज चुके थे। सबसे अंत में बैठनेवाले थे श्री सत्यनारायण जी। उनकी देर से तैयार होने की आदत अंत तक हर जगह आध-एक घंटे की देर होने की बजह बनी रही। समूह-यात्रा में ऐसी अनावष्यक देरी का खामियाजा पूरे दल को भुगतना पड़ता है। मैं गोईल जी के साथ बैठा। हमारे आगे गुप्ता दम्पत्ति बैठे थे।हम 2 घंटे से अधिक लेट हो गए थे पर यह सिलसिला बंद होने का नाम नहीं ले रहा था। कोई दवाई खरीदने तो कोई फास्ट फूड खरीदने बस रुकवाता रहा। अस्तु, बस ने जैसे-तैसे गोरखपुर षहर को छोड़ा और हम सौनोली, जो भारत-नेपाल सीमा पर बसा एक छोटा-सा सीमांत षहर है, के लिए चल पड़े। रास्ते में कई जगह केले के बगीचे दिखाई दिए, गन्ना तो यहाँ होता ही है। एक बात जिसने खासतौर पर ध्यान खींचा वह थी हर तरफ तोरई या गिलकी की बेलों की भरमार । क्या खेत, क्या खलियान, क्या घर, क्या आँगन ? यहाँ तक कि घूरों पर भी तोरई की बेलें फैली थीं। लगता है कि तराई का क्षेत्र तोरई के लिए कुछ अधिक अनुकूल है। सड़क खस्ताहाल थी। हमारी पच्चीस सीटर बस मध्यम गति से बढ़ रही थी। बसचालक को चाय पीनी थी। कुछ कागज़-पत्रों की फोटोकाॅपी भी करानी थी इसलिए बस रोकी गई। चाय की दुकान पर प्याज के गरम-गरम भजिए बन रहे थे। मैंने और बादल जी ने उनका रसास्वादन लिया। बस के अंदर अधिकांष सहयात्री निद्रारस का आनंद ले रहे थे या पाथेय का बोझ कम रहे थे।उनके पाथेय में हिस्सा बँटाना मेरा परम कत्र्तव्य था जिसे मंै अंत तक निभाता रहा। बस चली तो फिर 2 बजे करीब सौनोली को पार कर सीमा पर बने एक बड़े ,द्वार को पार कर दोनों देषों के बीच खड़ी हो गई। सौनोली जैसा गंदा षहर दूसरा होना मुष्किल है। लगता था सड़कों ने वर्षों से झाड़ू का मुँह नहीं देखा था। यहाँ के लोग सफाई के प्रति इतने ही जागरुक थे कि अपने घरों या दुकानों से कूड़ा-कचड़ा झाड़कर सड़क पर डाल दें। माननीय प्रधानमंत्री जी का स्वच्छता- आह्वान न तो नागरिकों पर, न ही प्रषासन पर कोई असर डाल सका था।
सीमा पर प्रवेष की कुछ औपचारिकताएँ पूरी की जानी थीं। नेपाल में सड़क मार्ग से प्रवेष के लिए फिलहाल पासपोर्ट की जरूरत नहीं है। किसी भी वैध परिचय पत्र जैसे मतदाता परिचय पत्र, ड्राईविंग लायसेंस आदि से काम चल जाता है। हमें यहाँ कुछ नहीं करना पड़ा। सारी औपचारिकताएँ बस में साथ आए ट्रेवल्स के एक कर्मचारी गोलू को पूरी करनी थीं, जिसकी सगाई इसी सप्ताह होनेवाली थी और इस बजह से उसे लौटने की जल्दी हमसे अधिक थी। हम सबने यहाँ चाय पी और भारतीय मुद्रा को नेपाली मुद्रा में बदलवाया। भारत का एक रुपया नेपाल के एक रुपए साठ पैसे के बराबर है। प्रत्येक व्यक्ति ने एक हजार पाँच सौ रुपए बदलने को दिए। जिन्हें गोलू ने बदलवाकर दो हजार चार सौ रुपए लाकर दे दिए।  वैसे सारे नेपाल में भारतीय मुद्रा सहजता से स्वीकार की जाती है। यहाँ के  लोग अपनी वस्तु या सेवा की कीमत दोनों मुद्राओं में बता देते हैं। आप जिसमें चाहें भुगतान कर सकते हैं। बड़ी संख्या में नेपाली महिलाएँ, पुरुष और बच्चे पैदल भारतीय सीमा में आ-जा रहे थे। कुछ विदेषी पर्यटक भी थे (भारतीयों के अतिरिक्त)। सुरक्षाकर्मी अपने-अपने काम में मुस्तैद थे। बगल में कस्टम विभाग का कार्यालय था। जहाँ सामान आदि की जाँच की जा रही थी। 
अब प्रतीक्षा थी ड्राईवर की जिसे कागज़ाद लेकर अब तक आ जाना था। तभी हमारे गुप्ता जी को अण्डरवियर और बनियान खरीदने ध्यान आया। देर हो जाने का कारण बताते हुए उन्हें रोकने का सामूहिक प्रयास किया गया जो पूरी तरह ही नहीं बुरी तरह भी असफल सिद्ध हुआ। गुप्ता जी अपने स्वदेष प्रेम का परिचय देते हुए वापस भारतीय सीमा यानि सौनोली के बाजार चले गए। गुप्ता जी का जाना और ड्राईवर का आना लगभग साथ-साथ हुआ। अब हम गुप्ता जी की प्रतीक्षा कर रहे थे।  हमारा अंदाज था कि उन्हें पंद्रह-बीस मिनट लगेंगे। हमारा अनुमान गुप्ता जी के स्वभाव के कितने प्रतिकूल था इसका पता हमें जब तक चला तब तक पौन घंटा हो चुका था। हमें लगा कहीं गुप्ता जी रेडीमेड अण्डरवियर और बनियान लेने के बजाय कपड़ा लेकर दर्जी से सिलवाने न लगे हों। कोई कह रहा था, लगता है कस्टमवालों ने रोक लिया है। इस हँसी-मजाक से मन-ही-मन नाराज हो रहीं श्रीमती मिथलेष कठैल (गुप्ता) अब चिंतित भी होने लगीं थीं। उन्हें ढूँढ़ने ंके लिए खोजी दस्ते भेजना आवष्यक हो गया था। सबसे पहले गोलू, फिर श्री रमेष-महेष अंत में मैं स्वयं गया। मेरा जाना इस अर्थ में सार्थक रहा कि मैं इन सबको लेकर ही लौटा क्योंकि सब लोग मुझे भारतीय द्वार पर ही लौटते हुए मिल गए। यह घटना बहुत देर तक मन बहलाव का कारण बनी रही साथ ही लोगों ने अनावष्यक रूप से देर कराने के कारण हँसी-हँसी में ही सही गुप्ता जी को बहुत कुछ कहा पर गुप्ता जी पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ पर श्रीमती गुप्ता की भौहें टेढ़ी होते देख सबने इस  एकांकी का पटाक्षेप करने में ही भलाई समझी। हाँ, इससे पहले हम अपने कवि होने का परिचय देने से नहीं चूके और गुप्ता जी की प्रसिद्ध कविता ‘चाबी, चाबी, चाबी............की तर्ज पर चड्डी, चड्डी, चड्डी......। पैरोडी बना डाली और गा भी डाली।
आखिरकार बस रवाना हुई और नेपाली नगर भैरहवा जो सीमा पर ही (लगभग 7 कि.मी.) बसा है, पहुँचे। यहाँ फोरलैन सड़क का निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए बस एक गली से निकाली गई। चालक ने किसी काम से बस रोकी तो सब लोग उतर गए। एक तरफ काफी झाड़ियाँ थीं जिनका उपयोग लघुषंका से निवृत होने के लिए किया गया (क्योंकि सीमा पर इसकी सुविधा पाँच रुपए में उपलब्ध थी।) इसी बीच गोईल जी भाईसाहब ने अच्छी तरह से दाम सुने बिना एक दुकान पर चार दर्जन केलों का आर्डर दे दिया। मैंने उन्हें टोका कि केलों का मुल्य 60 रुपए दर्जन नेपाली मुद्रा है तो वे संकोच में पड़ गए। मैंने दुकानदार से डेढ़ दर्जन केले देने को कहा। चालक और गोलू सहित हम 17 लोग ही थे। केले अच्छे पके और बड़े थे। सबके हिस्से में एक-एक केला आना था पर बचा हुआ एक केला किसके पेट में गया इसका पता नहीं चला। गोलू ने साफ षब्दों में हिदायत दी थी कि छिलके सड़क पर न फेंकें, पोलीथिन में इकट्ठा कर लें जिन्हें उचित जगह फेंक दिया जाएगा। पर हमारे आगे बैठे, पाठकों के सुपरिचित सहयात्री ने अपने और अपनी श्रीमती जी के छिलके (केले के) रोकते-रोकते भी खिड़की से बाहर उछाल दिए। मैंने ही नहीं इस साइड बैठे कई लोगों ने देखा कि छिलके वहाँ से गुजरते एक साईकिलसवार के मुँह से कुछ ही इंच की दूरी से निकल गए। साईकिलसवार चैंक गया, उसने मुड़कर तेजी से निकल चुकी बस को देखा और कुछ कहा। मैं सुन तो नहीं पाया पर मुझे पूरा विष्वास है कि उसने कुछ मोटे-मोटे अपषब्द हमारे सम्मान में अवष्य उछाले होंगे। वे श्रीमान एक बार फिर सभी की भत्र्सना को सहजता से पचा गए। गोलू और चालक हमारी सभ्यता के छिलके इस तरह उतरते देखकर मन में जरूर हँसे होंगे। इस अप्रिय प्रसंग से ध्यान हटाने लिए मैंने आँखें बंद कर लेना ही ठीक समझा। अब हम भगवान गौतम बुद्ध की जन्मभूमि लुम्बिनी पहुँचनेवाले थे।
       लुम्बिनी- भैरहवा से लुम्बिनी अधिक दूर नहीं है। यह नेपाल के रूपन्देही जिले में भारतीय सीमा के निकट ही है। कपिलवस्तु से 24 कि.मी. की दूरी पर स्थित यह स्थान बौद्ध धर्म के चार प्रमुख पवित्र स्थलों में से एक है। ये चार हैं। 1. लुम्बिनी, तथागत का जन्म स्थान, 2. बोध गया, सम्बोधि स्थल, 3. सारनाथ, धर्मचक्र प्रवर्तन स्थल, 4. कुषीनगर, निर्वाण स्थल।
आँखें खुली तो पता चला कि लुम्बिनी ग्राम आ चुका था। चार बज चुके थे। चालक ने बस उस जगह खड़ी कर दी जहाँ से पर्यटक पैदल, रिक्षे अथवा आटो रिक्षे से भगवान बुद्ध की जन्मभूमि स्थल या स्मारक के दर्षन करने जा सकते हैं। यह जगह बिल्कुल सुविधाविहीन थी। थोड़ी-सीं खाने-पीने और बौद्ध धर्म से संबंधित सामग्री बेचनेवाली छप्परनुमा दुकानें, कुछ रिक्षे और आटो रिक्षे, दिन की इस अवसान बेला में आज के आखिरी पर्यटकों की प्रतीक्षा कर रहे थे। हमें देखकर उनमें कुछ प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई हो ऐसा उनके चेहरों से लग नहीे रहा था। यह एक व्यावसायिक चाल होती है जिसमंे पहल करनेवाला घाटे में रहता है। चूँकि दर्षन हमें करने थे, उन्हें नहीं इसलिए पहल हमीें ने की। समय कम था। अँधेरा होने से पहले ही दर्षन कर लेना आवष्यक था। हमारी इस समय सीमा को वे अच्छी तरह समझते थे। आटोवाले पाँच सवारियों के एक हजार रुपए माँग रहे थे, वह भी भारतीय मुद्रा में। रिक्षेवाले भी मुँह फाड़ रहे थे।  हमारे दल में सेवानिवृत लोगों की संख्या अधिक थी जो स्वाभाविक रूप से किफायत पर जोर देते हैं। सो सौदा नहीं पटा। हमारे दलनायक दम्पत्ति पहले भी यहाँ चुके थे। श्रीमती षर्मा की राय पर पैदल जाना ही तै किया गया जिनके अनुसार स्मारक पन्द्रह-बीस मिनट की दूरी पर ही था। दिन भर बस में बैठे रहने के कारण पैदा पैरों की जकड़न चलने से तो दूर होगी ही और यात्रा की षुरूआत में ही जेब भी हल्की होने से बचेगी इस दृष्टि से पैदल जाना फायदेमंद तो था ही। मुझ जैसे हर साल अमरनाथ यात्रा पर जानेवाले के लिए इसमें कोई परेषानी का प्रष्न भी नहीं था। दुकानों के बीच से होते हुए हम सब टिकट खिड़की पर पहुँचे। जहाँ 10 रु.(भा.) प्रति व्यक्ति की दर से पन्द्रह टिकट लिए गए। हम लोग बौद्ध म्यूजियम के सामने बने एक बड़े-से गेट को पार करके दाँयी तरफ आगे बढ़े। यहाँ से रास्ता दो भागों में बँट गया था। बीच में एक नहरनुमा खाई या खाईनुमा नहर थी जो जल से आपूरित थी। रास्ता मजबूत पक्की ईंटों से बना था। ईंटों के बगल से छोटे वाहनों के लिए सँकरी-सी सड़क बनी थी। मैं जल्दी-जल्दी आगे बढ़ गया ताकि दर्षनों के लिए अधिक समय मिल सके। नहर या खाई पर कुछ अंतराल पर दो मेहराबदार पुल बने थे। दोनों तरफ घनी झाड़ियाँ और पेड़। दाँयी तरफ पेड़ों के पीछे कुछ कलात्मक वास्तुषिल्पयुक्त इमारतें दिखाई दे रहीं थीं। पुल से दूसरी तरफ जाने और वहाँ लगे सूचनापट से पता चला कि उस तरफ जर्मनी और कुछ दक्षिण-पूर्वी बौद्धबहुल देषों द्वारा बनवाए गए बौद्ध विहार हैं जिनके बंद होने का समय 5 बजे साँयकाल था जो अब करीब ही था। वहाँ जाने का न तो समय था न ही इच्छा।  हमारी प्राथमिकता थी, जन्मस्थली के दर्षन करना। मैं उसी तरफ से वहाँ पहुँचा जहाँ नहर समाप्त हो गई थी और दोनों रास्ते एक हो गए थे। नहर में एक बड़ी-सी नाव  आधी पानी में और आधी किनारे पर पड़ी थी। जो षायद पर्यटकों को लाने-ले जाने या नहर में घुमाने के काम आती होगी। नहर के इस छोर पर एक गोल क्यारी के बीच सफेद पत्थर से निर्मित धनाकृति पर एक छोटा-सा पात्र बना था जिसके बीचोंबीच एक ज्योति प्रज्ज्वलित थी। इसे षांति ज्योति कहा जाता है। बाँयी तरफ एक रास्ता म्यंयार (वर्मा) द्वारा बनवाए गए स्वर्णस्तूप (लोकमणि पैगोडा) की ओर गया था। उसी तरफ बगल में धातु का बना एक विषाल घंटा दो स्तंभों के सहारे लटक रहा था। नहर के सिरे के लम्बबत एक चैड़ा पक्का मार्ग जन्मस्थल की ओर गया है। लगभग एक सौ मीटर आगे एक बड़े कमल की आकृतिवाले चबूतरे पर एक ऊँचे और अलंकृत आधार स्तंभ पर भगवान बुद्ध की बाल-प्रतिमा खड़ी मुद्रा में स्थापित है। यह प्रतिमा दुनिया भर के बौद्ध बच्चों द्वारा एकत्र राषि से बनाई गई है। मैं आगे बढ़ता गया। रास्ते में दाँयी तरफ प्रसाधन सुविधाएँ थीं। अब एक और बड़ा-सा गेट दिखाई देने लगा था जहाँ सुरक्षा कर्मचारी टिकट देखकर अंदर जाने दे रहे थे। अब मुझे अपनी एक भूल का ज्ञान हुआ। मैं जल्दी पहुँचने के चक्कर में गोईल जी से टिकट लिए बिना ही चला आया था। पीछे लौटना पड़ा। फिर गोईल जी के साथ मुख्य द्वार पर आया। जूता स्टेण्ड पर दोनों ने झटपट अपनी-अपनी चरणपादुकाएँ रखीं और भीतर प्रवेष किया। षेष लोग भी पीछे ही थे।
    भीतर एक विषाल प्रांगण में सफेद पत्थरों से नवनिर्मित एक चैकोर इमारत बनी थी यही महामाया देवी मंदिर था जिसके चारों ओर उद्यान था जिसमें कहीं-कहीं ईंटों से बनी दीवारों के ध्वंषावषेष दृष्टिगोचर हो रहे थे। एक तरफ एक प्रस्तर-स्तंभ खड़ा था। उसी के समीप कुछ अलंकृत षिखरों के अवषेष पड़े थे। एक चैड़ी-सी दीवार के निकट पत्थर की लम्बी चार मेखलाओं वाली दो सीढ़ियों में से एक पर बहुत से दीप जल रहे थे। पाष्र्व में बनी एक छोटी-सी चैकोर पुष्करिणी में महामाया देवी मंदिर की छाया पड़ रही थी।  बड़ी संख्या में देषी-विदेषी पर्यटक और श्रद्धालु उपस्थित थे। मैं गोईल जी के साथ उस बड़े-से भवन में गया। वाह ! क्या अद्भुत दृष्य था !! उस विषाल भवन की दीवारों और छत से आवृत उस परिसर में आज से लगभग ढाई हजार साल हुई एक अलौकिक घटना के परिचायक एक पवित्र स्तूप या बौद्ध विहार के पुरावषेष संरक्षित थे। यह पूरा परिसर लुम्बिनी विकास न्यास के अंतर्गत है। लुम्बिनी की यही वह पवित्र एवं दिव्य देवभूमि थी जहाँ 544 ई.पू. विष्व को अहिंसा, करुणा और षांति का अमर संदेष सुनाने को भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। उनके जन्म की कथा भी अलौकिक थी। मैं उस पावन जन्मकथा को सुनने के लिए अपने आप में खो गया। मेरा मन स्वयं ही वाचक और स्वयं ही श्रोता था।
    ‘आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व यह सम्पूर्ण क्षेत्र भरत खंड आर्यावर्त के रूप में प्रसिद्ध था। हिमालय पर्वत की षिवालिक उपत्यका के चरणप्रदेष (तराई क्षेत्र) में मगध और कौषल देषों के मध्य कपिलवस्तु नामक एक छोटा-सा राज्य अवस्थित था। कपिलवस्तु के राजसिंहासन पर षाक्यवंषीय महाराज षुद्धोधन विराजमान थे।
    कपिलवस्तु नगर के समीप ही पुण्यसलिला रोहिणी नदी बहती थी। रोहिणी के दूसरे तट पर देवदह का राज्य स्थित था। दोनों राज्यों के मध्य बहती रोहिणी नदी परस्पर
विवाद का कारण थी। नदी पर एकमेव स्वामित्व का परिवाद अंततः युद्ध में परिणीत हो गया। देवदह का कोलिय राजवंष पराजित हुआ। संधि की षर्तों के अनुसार न केवल रोहिणी नदी पर कपिलवस्तु का सम्पूर्ण अधिकार माना गया वरन कोलिय राजवंष की दोनों राजकन्याओं महामाया और प्रजापति गौतमी का विवाह भी महाराज षुद्धोधन से कर दिया गया।
महामाया महारानी के पद पर सुषोभित हुईं। एक बार महारानी महामाया ने रात्रि में एक विचित्र स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि चार देवदूत पलंग सहित उठाकर उन्हें हिमालय पर्वत पर मनोषिला नामक स्थल पर ले गए। जहाँ से उन्हें देवकन्याओं ने मानसरोवर के जल में स्नान कराया। तभी एक विषाल ष्वेत गजराज जिसकी सूँड़ में एक दिव्य कमल पुष्प था,उनके समीप आया। उस गज ने ंमहारानी महामाया की तीन परिक्रमा कीं और उनकी कोख में प्रविष्ट हो गया।
    प्रातःकाल महाराज ने इस स्वप्न का वृतांत सुनकर षाक्य कुल पुरोहितों, तपस्वी ब्राह्मणों और भविष्यवक्ताओं को आमंत्रित कर इसका फलादेष पूछा। सबने गणना और परस्पर विचारविमर्ष कर घोषणा की-‘‘राजन्, स्वप्न अत्यंत मंगलकारी है। महारानी गर्भवती हैं। आपको उनकी कोख से एक अति तेजस्वी पुत्ररत्न प्राप्त होगा। यदि बालक ने गृहस्थ जीवन में प्रवेष लिया तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा किन्तु...।’’
‘‘किन्तु क्या ? ब्राह्मण देवता, महाराज ने कुछ उद्िवग्न होकर पूछा।
‘‘ महाराज, काल रेखाएँ बता रहीं हैं कि यदि जातक संसार से विमुख होकर वैराग्य पथ पर चल पड़ा तो वह संबोधित्व को प्राप्त कर इस संसार का त्राता बनेगा। इस बालक की यही दो गतियाँ हैं। चक्रवर्ती सम्राट अथवा सम्यक सम्बुद्ध।’’
हम राजपुत्र में वैराग्य भाव उत्पन्न ही नहीं होने देंगे। मन-ही-मन यह निष्चय कर महाराज षुद्धोधन ने यथायोग्य स्वर्ण मुद्राएँ, गौएँ, रथ, अष्व और गजादि भेंट कर षाक्य कुल पुरोहितों, तपस्वी ब्राह्मणों और भविष्यवक्ताओं को विदा किया।
    गर्भस्थ षिषु मायादेवी के उदर में उसी प्रकार पलने लगा जैसे सीप में मुक्ता।        
प्रसवकाल समीप था। प्रथम प्रसव मायके में सम्पन्न हो इस सामान्य परम्परा के अनुसार एक दिन महारानी ने अपने नैहर देवदह जाने की इच्छा व्यक्त की। महाराज ने सहर्ष स्वीकृति देते हुए तत्काल आवष्यक व्यवस्थाएँ करवा दीं। दोनों राज्यों में मैत्री हो जाने के बाद कपिलवस्तु और देवदह का राजमार्ग पंथागारों और उद्यानों से सम्पन्न था। दोनों नगरों के मध्यएक अति रमणीय और मनोहारी उपवन था। जिसका नाम लुम्बिनी था। देवदह जाते समय मायादेवी ने इस स्थान पर मोहित होकर यहाँ कुछ देर रुकने और विश्राम का निष्चय किया। साथ चल रहीं बहिन प्रजापति गौतमी, दूसरी सखियों तथा सेवक-सेविकाओं ने तत्काल यथोचित व्यवस्था कर दी। उपवन में षताधिक क्यारियाँ रंग-बिरंगे पुष्पों से पुिष्पत नयनाभिराम दृष्य प्रस्तुत कर रहीं थीं। पुिष्पत लताओं से आच्छादित विषाल षालवृक्ष भी षोभायमान हो रहे थे। पक्षियों के कलरव और पत्तों की मर-मर ध्वनि में आज कुछ विषेष परिवर्तन और प्रयोजन परिलक्षित हो रहा था। लगता था कि प्रकृति को किसी अलौकिक घटना का पूर्वाभास हो चुका था।
    लुम्बिनी के इस विषाल षाल वन-उपवन में भ्रमण करती महादेवी ने श्रमित होकर जैसे ही एक महाषाल वृक्ष की लचीली षाख को पकड़ा उसी समय प्रसव पीड़ा आरंभ हो गई। विद्युत गति से निकटस्थ चल रहीं परिचारिकाओं और अनुभवी दासियों ने ओट की। इसी समय वातावरण में जैसे षंख ध्वनि गूँजने लगी, पुिष्पत लताओं से पुष्प वर्षा होने लगी मानो आकाष से देवगण अजस्र पुष्प वर्षा कर रहे हों। मयूर नृत्य करने लगे। सारिका आदि गान-प्रवीण पक्षी गा उठे। पलक झपकते ही षिषु बोधिसत्व का प्राकाट्य हो गया। जननी को लेटने या बैठने का अवसर ही नहीं मिल सका। लगता था महामाया देवी के साथ अदृष्य रूप में रहनेवाले चार देवपुत्रों ने उन्हें अधर में ही सँभालकर जननी को सौंप दिया हो। (लोक मान्यता है कि बोधिसत्व का जन्म खड़े-खड़े ही होता है। जन्म के समय वे रक्त, मज्जा, ष्लेष्मा, गर्भजल आदि अषुद्धियों से अलिप्त होते हैं। अर्थात पूर्ण षुद्ध होते हैं। वे तुरंत अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं और उत्तर दिषा की ओर सात पग चलते हैं।) पवनवेगी अष्वों पर सवार होकर संदेषवाहकों ने कपिलवस्तु और देवदह मंे यह षुभ समाचार जा सुनाया। दोनों राजगृहों में आनंद का पारावार न रहा। वाद्य-वृन्द बज उठे। षिषु को राजप्रासाद में लाया गया। प्रजा भी उत्सव मनाने लगी। राजपरिवार और प्रजा सभी मोदमग्न थे किन्तु विधाता के मन में कुछ और ही था। महारानी का स्वास्थ्य उसी समय से बिगड़ने लगा। चिकित्सा के सभी प्रयास असफल रहे। षिषु के जन्म के सातवें दिवस महामायादेवी का निधन हो गया। षिषु के पालनपोषण का दायित्व अब विमाता मौसी प्रजापति गौतमी पर आ गया। सुयोग्य उत्तराधिकारी प्राप्ति की कामना पूर्ण (अर्थसिद्ध) होने के कारण राजपुत्र का नाम ‘सिद्धार्थ’ रखा गया। विमाता प्रजापति गौतमी के पालित पुत्र होने से ‘सिद्धार्थ’ का दूसरा नाम ‘गौतम’ भी था।’’
    ‘अरे भाई चलना नहीं है क्या ?’ गोईल जी के टोकने पर मैं जैसे तंद्रा से जागा। कोई रोके-टोके उससे पहले ही मैंने झटपट दो फोटो उतार लिए। वहाँ तैनात एक गार्ड ने टोका भी जिस पर मैंने बड़ा भोलापन दिखाते हुए साॅरी बोल दिया। उसने भी कोई खास नोटिस नहीं लिया और यह अलौकिक स्थान मेरे कैमरे में सुरक्षित हो गया। हम लोग थोड़ा-सा घूमकर वहाँ पहुँचे जहाँ एक गड्ढेनुमा जगह में कुछ रोषनी हो रही थी। झाँककर देखा कि वहाँ रुपयों का ढेर लगा था। यही वह परम-पावन स्थल था जिसे भगवान बुद्ध का जन्म स्थान माना जाता है। न कोई प्रतिमा न कोई पुजारी। षांत वातावरण। बुद्धं षरणं गच्छामि, धम्मं षरणं गच्छामि, संघं षरणं गच्छामि का दिव्य घोष मन में गूँज ही रहा था। भग्न दीवारों की ईटें कुछ स्वर्णिम आभा लिए थीं पता नहीं कोई रंग लगाया गया था या उनकी मिट्टी में ही कोई विषेषता थी। इस स्थल की खोज सन् 1896 में जर्मन पुरातत्ववेत्ता डाॅ. फूहरर ने की थी। बाद में खड़््ग षमषेर राना के नेतृत्व में इस स्थल की खुदाई की गई। यहाँ एक बौद्ध स्तूप एवं एक प्रस्तर निर्मित अष्व स्तम्भ के ध्वंषावषेष मिले थे जिसके बारे में कहा जाता है कि इन्हंे सम्राट अषोक ने बनवाया था। स्तम्भ के सिरे पर अष्व मूर्ति उत्कीर्ण थी जो संभवतः बाद में हूणों द्वारा तोड़ दी गई थी। सम्राट अषोक का यहाँ अपने राज्यारोहण के बीसवें वर्ष (ई.पू. 249) में आगमन हुआ था। यहाँ मिले अषोक स्तम्भ पर अंकित लेख से प्रमाणित हो चुका है कि यही मूल लुम्बिनी है। यह लेख इस प्रकार है। ‘देवानपियेन पियदार्षना लाजिना बीसतिवसाभिसितेन अतन आगाया महीपते हिद बुधेजाते साक्यमुनिति सिलाबिगड़भी चाकालापित सिलाथ मेच उसपापिते हिद भगवं जातेति लुम्मनिगामे उबलिके कटे अठभागिए च।’ अर्थात ‘देवानांप्रिय प्रियदर्षी राजा (सम्राट अषोक) ने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष में यहाँ आकर बुद्ध की पूजा की। लुम्बिनी ग्राम को बलिकर से मुक्त किया और भूमिकर को छठे भाग के स्थान पर आठवाँ भाग कर दिया।’
    स्थल की प्राचीनता चीनी यात्री फाहियान और युआनचांग के यात्रा वर्णनों से भी प्रमाणित होती है। सन् 1997 ई. में यूनीसेफ द्वारा इस स्थान को ‘विष्व विरासत’ घोषित किया गया। यहाँ महामाया देवी मंदिर के अतिरिक्त विभिन्न देषों द्वारा बनवाए गए चैत्य भी दर्षनीय हैं। इनमें विष्व षान्ति स्तूप, थाई मंदिर, ग्रेट लोटस स्तूप, लोकमणि कुल पैगोडा आदि मुख्य हैं। ंसमयाभाव के कारण इनमें से केवल लोकमणि स्तूप के दर्षन बाहर से ही हो सके वह भी सिर्फ मेरे और गोइल जी के द्वारा। कुछ समूह फोटोग्राफ्स लेकर हम लौट पड़े। बाल बुद्ध प्रतिमा के साथ भी फोटोग्राफ्स लिए गए। मैं और गोईल जी लोकमणि कुल पैगोडा देखने के लिए जल्दी आगें बढ़ गए पर कोई लाभ नहीं हुआ। पैगोडा का मुख्य द्वार बंद हो चुका था। वर्मा देष (म्यंमार) द्वारा बनवाए गए स्वर्णिम आभावाले इस पैगोडा का उद्घाटन वहाँ के तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘यू नू’ ने किया था। यहाँ की विषाल बुद्ध प्रतिमा वर्मा में ही बनी थी। यहाँ से वापिस आते समय एक रिक्षे को देखकर गोईल जी को अपनी थकान की अनुभूति हुई। नेपाली 100 रु. में लौटना तै हो गया पर जैसे ही हम दोनों सवार होकर षांति ज्योति के निकट पहुँचे वहाँ खड़े रिक्षेवालों ने हमारे रिक्षेवाले को आड़े हाथों लेना षुरू कर दिया। असल में सवारी ले जाने का नम्बर किसी दूसरे का था। उन्हें झगड़ता छोड़ हम पुनः पैदल चल पड़े। चार कदम ही चले होंगे कि जिस रिक्षेवाले का नम्बर था पीछे-पीछे आ गया। हम उसके रिक्षे पर बैठ गए। थोड़ा ही चले थे कि रास्ते में डाॅ. दुर्गेष जी पैदल जाते मिल गए। अपने साहित्यिक गुरु जिनकी आयु 76 वर्ष हो, को पैदल और स्वयं रिक्षे पर जाना मेरे लिए लज्जा की बात थी। मैं रिक्षे से उतर गया और जबरन दीक्षित जी को बैठा दिया। पर लगता था पैदल लौटना मेरे भाग्य में नहीं था। बादल जी ने एक जाते हुए रिक्षे को पकड़ा और मुझे भी बैठा लिया। आगे बढ़ने पर देखा कि दीक्षित जी पूर्ववत पैदल जा रहे हैं, पता चला कि उन्होंने अपनी जगह अपनी बहू मनीषा को रिक्षे पर बिठा दिया था। इस तरह हमने रिक्षेवाले से दो सवारी ले जाने के सौदे का पूरा (और बेजा) फायदा उठाया। मैंने दीक्षित जी से दूसरे रिक्षे पर बैठने का फिर अनुरोध किया पर वे नहीं माने। वैसे भी प्रतिदिन चार-पाँच कि.मी. प्रातः भ्रमण करनेवालों में से हैं। हम बस के लगभग करीब आ भी चुके थे। धीरे-धीरे सब लोग आ गए और पानी आदि पीकर बस में सवार हो गए। अब हमारी मंजिल जनकपुर था। करोड़ों सनातन धर्मावलम्बियों के आराध्य भगवान श्रीराम की चिर सहचरी माता भगवती सीता अर्थात जगत जननी माँ जानकी की जन्मभूमि जनकपुर । जहाँ हमें रात्रि विश्राम करना था पर चालक के कहे अनुसार हम वहाँ तीन बजे प्रातः पहुँचने वाले थे। इसका अर्थ था कि रात्रि विश्राम का अधिकांष भाग हमें बस में ही पूरा करना था। भगवान बुद्ध के जयघोष के साथ हमने लुम्बिनी को प्रणाम कर उस पावन भूमि से बिदा ली।
 भारत और नेपाल की सांस्कृतिक कड़ी- जनकपुर धाम
 जनकपुर महाराज विदेह जनक के मिथिला साम्राज्य की राजधानी रहा है। जनकपुर नेपाल की राजधानी काठमाण्डू जिसे यहाँ काठमाण्डौ लिखा जाता है, से लगभग 400 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में जनकपुर मण्डल के अंतर्गत जिला धनुषा में बसा दक्षिण-पूर्व नेपाल का एक महत्वपूर्ण नगर है। यह नेपाल का एकमात्र नगर है जो रेल से जुड़ा है। नेपाल की जयनगर जनकपुर रेललाइन यहाँ तक पहँचती है। यह बिहार (भारत) के मधुबनी जिले के ठीक उत्तर में भारतीय सीमा से मात्र 20 कि.मी. दूर है। चूँकि हमने अपनी यात्रा का आरंभ गोरखपुर से किया था इसलिए हमें जनकपुर धाम जाने के लिए लम्बा मार्ग तय करना पड़ा। लुम्बिनी के बाद हम वापिस भैरहवा लौटे। षाम हो चुकी थी। अभी जाड़ों की षुरूआत ही थी पर ऋतु के अनुरूप अँधेरा जल्दी होने लगा था। दिन भर बस की यात्रा और लुम्बिनी में पैदल घूमने के कारण षरीर थक गया था। भैरहवा निकलते-निकलते कब नींद आ गई पता नहीं चला। आँख खुली तो देखा बस पहाड़ी रास्ते से गुजर रही थी। मैं खिड़की की तरफ बैठा था। चाँदनी रात थी। बाहर छात्र जीवन में पढ़ी पंचवटी की यह पंक्ति ‘षुभ्र ज्योत्सना बिखर रही थी अवनि और अंबर तल में’ साकार हो रहीं थीं। ऊँचे और सघन पेड़ों के बीच घुमावदार पहाड़ी रास्ते, जिसकी दिन भर से प्रतीक्षा थी से गुजरना अच्छा लग रहा था। वैसे यह क्षेत्र हिमालय की तराई में स्थित है। पूर्वी, मध्य और पष्चिमी नेपाल को जोड़नेवाले इस राजमार्ग के कुछ हिस्से षिवालिक पहाड़ियों को चीरते हुए निकलते हैं। हिमालय से उतरनेवालीं कई छोटी-बड़ी नदियों ने इस सड़क के कई टुकड़े कर दिए हैं इन टुकड़ों के किनारों को लोहे के बड़े-बड़े पुलों के धागे से जोड़ दिया गया है। इन पुलों में कई तो दो सौ-तीन सौ मीटर लम्बे हैं।  सड़क का अधिकांष भाग अच्छा था पर जहाँ गड्ढे थे वे कुछ परिचित भारतीय सड़कों की याद दिलाने के लिए काफी थे। रास्ते में कई बेरीकेट मिले जिन पर रात्रि प्रहरी खड़े थे। उन्हें परमिट और पत्रम्-पुष्पम् से संतुष्ट करने का काम गोलू के जिम्मे था।
काफी समय आराम कर लेने के बाद दल के सदस्य भी तरोताजा हो चुके थे। बातचीत होने लगी थी। बातचीत का एक प्रमुख विषय रात्रि-भोजन था। पाथेय में लाई गईं पूरियाँ दिन में ही समाप्त हो गई थीं। वैसे भी अब ताजे भोजन की इच्छा बलबती हो चुकी थी। रमेष जी षर्मा को भूख कुछ अधिक ही सताने लगी थी। दलनायक आर.एस.षर्मा बसचालक से किसी षाकाहारी भोजनालय पर रुकने के लिए बोल चुके थे। बसचालक था कि आगे अच्छा षाकाहारी भोजन मिलेगा कहते हुए बस बढ़ाए जा रहा था। आखिर एक भोजनालय पर बस रुकी। सब लोग फटाफट नीचे उतरे पर पता चला कि भोजनालय विषुद्ध षाकाहारी न होकर मिला-जुला था जिसमें भोजन करना हमारे ब्राह्मण-बहुल दल के किसी भी सदस्य को स्वीकार न था। भोजनालय के इस अघोषित बहिष्कार का परिणाम यह हुआ कि भोजनालय के मालिक ने कुछ लोगों को पानी देने से भी मना कर दिया। बस फिर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी। कुछ सदस्य अपने सूखे मीठे और नमकीन पाथेय का सहारा लेकर अपनी भूख षांत करने लगे। लगभग दस बजे नारायणगढ़ नामक एक बड़ा नगर आया। एक जगह षाकाहारी भोजनालय दिखा। रोको-रोको कहते हुए भी बस आगे निकल गई, बस को मोड़ा गया। बसचालक और एक-दो साथी उतरे। पता चला कि रसोइया चला गया है, बुलाना पड़ेगा। दो सौ रुपए में थाली मिलेगी। पता नहीं भूख षांत हो जाने के कारण या दाम सुनकर हम चार यानि मैं, महेष जी बादल, अभिनंदन जी गोईल और षर्मा जी (रमेष) के अलावा बाँकी लोगों ने खाने से इंकार कर दिया। बसचालक और सहायक को तो खाना ही था। थाली में दो रोटियाँ, दाल, दो बेस्वाद सब्जियाँ, चावल और दही था। दही था तो जरा-सा ही पर सबसे अच्छी चीज वही थी। 
भोजन उपरांत चले तो बसचालक ने नींद आने की बात कहकर हम सबकी नींद उड़ा दी। हमने उससे दो-तीन घंटे आराम करने को कहा पर वह नहीं माना। बस में कैसिट प्लेयर भी नहीं था। ऐसी रात्रिकालीन यात्रा में मैं स्वयं ही पुराने गाने गुनगुनाने लगता हूँ, आज भी वही किया। पहले ही गीत को मेरे साथ बैठे गोईल जी ने सराहा तो मेरी रही-सही झिझक भी दूर हो गई। फिर क्या था ? एक के बाद एक पुराने गीत याद आते गए और हम गाते गए। हमारी ये बिनाका गीतमाला अगले दिन यानि सुबह तीन बजे तब खत्म हुई जब बस जनकपुर पहुँचकर होटल के सामने जाकर रुकी। मेरे गीतों ने बसचालक को जगाने और साथियों को सुलाने में अपनी पूरी भूमिका निभाई। बस से सामान उतारकर मैं और गोईल जी एक कमरे में रुक गए। तीन-चार घंटे आराम करने का समय था पर अभी कपड़े बदल भी न पाए थे कि दलनायक षर्मा जी ने दरवाजा खटखटाया। भीतर आकर बोले, आप दोनों दूसरे कमरे में चले जाएँ, उसमें चार पलंग हैं। इस कमरे में श्री और श्रीमती दीनदयाल तिवारी जिन्हें कमरा नहीं मिल पाया है, रुक जाएँगे। मुझे और गोईल जी को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी, हाँ दोनांे को अपनी- अपनी श्रीमती न लाने का पछतावा जरूर हुआ। कपड़े और बैग समेटकर उस कमरे में पहुँचे जहाँ महेष जी और रमेष जी रुके थे। कमरा बड़ा जरूर था पर पलंग दो ही थे, वे भी अलग-अलग। एक सोफा भी था। मन में तो आया कि षर्मा जी को कुछ कहा जाए पर असुविधा से उत्पन्न आक्रोष को दबाकर बादल जी सोफे पर और मैं नीचे कम्बल बिछाकर लेट गया जो कि कमरे में विद्यमान सभी महानुभावों में सबसे छोटा होने के कारण मेरा जन्मसिद्ध अधिकार या कत्र्तव्य था। वैसे भी मैं ऐसी बातों को सम्मान-प्रष्न नहीं बनाता।
दीनदयाल जी ने सात बजे ही आकर जगा दिया, षायद वे सोए ही नहीं थे। नींद खुली तो देखा कि बादल जी दैनिक क्रियाओं से निवृत्त हो चुके थे यही नहीं  दो जोड़ी कपड़े भी धो लिए थे। गर्म पानी की सुविधा थी। बादल जी के बाद मैं, फिर गोईल जी और सबसे आखिर में षर्मा जी (रमेष) ने नहाया। नहाने का क्रम पूरी यात्रा मंे यही बना रहा। चाय कमरे में ही मँगाकर पी गई। एक प्याली का दाम सिर्फ पैंतीस रुपए, नेपाली मुद्रा में। साढ़े आठ बजे नीचे आकर देखा कि होटल धनुष चैक के बगल में ही था। चैक पर दो विषाल धनुषाकार मेहराब एक दूसरे को काटते हुए बनाए गए हैं। स्वाभाविक रूप से यह आकृति भगवान श्री राम द्वारा सीता-स्वयंवर में तोड़े गए षिव धनुष की स्मृति में बनाई गई है। जनकपुर से कुछ दूर धनुषा ग्राम में एक सरोवर के समीप एक पत्थर का धनुष भी पड़ा मिला था। नीचे श्रीमती मनीषा पुरोहित (डाॅ. दुर्गेष दीक्षित की पुत्रवधू) पहले से ही खड़ी थीं और बसचालक के न होने तथा दल के सभी सदस्यों के अभी तक तैयार न होने पर रोष जता रही थीं। मैंने उन्हें समझाने का असफल प्रयास किया कि बसचालक को अपनी नींद पूरी करना आवष्यक है, और अभी हमारा ‘सफर पूरा’ नहीं हुआ है। धीरे-धीरे सभी लोग सामान सहित नीचे आ गए। इस बीच मैं और गोईल जी पास के एक ‘खाजा घर’ में भरपेट पूरी-सब्जी का नाष्ता कर चुके थे। बसचालक अभी भी नदारद था। उसका मोबाइल भी बंद था। सब लोग अब सब्र खोने लगे थे सिवा मेरे और बादल जी के। बादल जी को अपने कपड़ों के सूखने के लिए समय चाहिए था और मैं अपने पूर्व अनुभवों के कारण समझ रहा था कि बसचालक अपनी नींद पूरी करके ही आएगा। खैर, दल के सब्र का प्याला भरने के पहले ही चालक आ गया। वह होटल में जगह न मिलने से किसी धर्मषाला में चला गया था।
अबकी बार सामान बस के भीतर ही रखा गया। कुछ ही देर में चालक ने बस जानकी मंदिर से लगभग आधा कि.मी. दूर खड़ी कर दी क्योंकि आगे सड़क काफी सँकरी थी। पैदल चलकर लोगों से पूछते हुए सबसे पहले हम श्रीराम मंदिर पहुँचे जो एक चहारदिवारी से घिरा एक सुंदर परिसर है। पेगोडा षैली में लाल ईटों से बने छोटे-से श्रीराम मंदिर के सामने बजरंगबली का मंदिर बना है। श्रीराम-जानकी की प्रतिमाएँ छोटी किन्तु अत्यंत मनोहर हैं। सामने ही श्रीराम सरोवर है। यहाँ से एक गली को पारकर हम सब एक लम्बे-चैड़े मैदान में पहुँचे तो जो दृष्य देखा उसे देखकर चित्रलिखित से रह गए। सामने अत्यंत आकर्षक और भव्य ‘नौलखा जानकी मंदिर’ अपने पूरे वैभव के साथ स्थित था। हिन्दू और मुगल स्थापत्य षैली में सफेद संगमरमर से चैकोर आकार में बना यह मंदिर 4860 वर्ग फुट में फैला है। इसकी ऊँचाई 50 फुट है। हर कोने पर तीन ओर गुम्बदाकार मीनारें बनी हैं। इसमें 60 कमरे हैंै। मंदिर की खिड़कियों में बारीक नक्काषीदार पत्थर लगे हैं। भीतर एक विषाल प्रांगण है जिसके मध्य में मंदिर स्थित है। गर्भगृह में माता जानकी सहित श्रीराम, श्री लक्ष्मण, श्री भरत और श्री षत्रुघ्न की स्वर्णमयी मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं।
मंदिर में काफी दर्षनार्थी उपस्थित थे। मूर्तियाँ और दरवाजा छोटे होने तथा कम प्रकाष के कारण दर्षनों के लिए दृष्टि पर जोर पड़ता है। हमारे किसी साथी ने बताया कि जानकी मंदिर अयोध्या के ‘कनक भवन’ जैसा है पर मेरी अयोध्या दर्षन की अभिलाषा अभी अधूरी होने से इस बारे मैं कुछ नहीं कह सकता। दर्षन उपरांत हम सबने महंत जी से भेंट की जो टीकमगढ़वाले महंत कहलाते हैं। टीकमगढ और जनकपुर के जानकी मंदिर का अटूट संबंध है। यह मंदिर हमारे टीकमगढ के महाराज प्रतापसिंह जू देव और उनकी महारानी वृषभानु कुँवरि ने बनवाया था। इसका निर्माण सन् 1893 ई. में आरंभ होकर सन् 1910 में पूर्ण हुआ था। इसे बनवाने में नौ लाख रुपए व्यय हुए थे इसलिए यह ‘नौलखा जानकी मंदिर’ के नाम से भी प्रसिद्ध है।  मंदिर गोरखा जनरल अमरसिंह थापा की देखरेख में बना था। कहते हैं कि सन् 1657 में इस स्थान पर माँ जानकी की स्वर्णमूर्ति मिली थी। सूरकिषोरदास नाम के एक संन्यासी माता सीता के परम उपासक थे। उन्होंने ही आधुनिक जनकपुर का विकास किया था।
 जानकी मंदिर के समीप ही ‘विवाह मंडप’ स्थित है। हम लोग पाँच-पाँच रुपए का प्रवेष टिकट लेकर अंदर गए। एक रमणीक उद्यान में दोहरी ढलवाँ छतोंवाला (पैगोडा षैली) यह मंडप इसी तरह के  चार छोटे-छोटे मंडपों के मध्य खड़ा है। कक्ष में बीचों-बीच श्रीराम और सीता जी की मूर्तियाँ बैठी हुई मुद्रा में स्थापित हैं। उनके दोनों ओर दो सखियाँ हार और पूजन सामग्री लिए खड़ीं हैं। सामने की ओर दाएँ महाराज दषरथ, गुरु वषिष्ठ और विष्वामित्र जी एवं बाएँ महाराज जनक, महारानी सुनयना, पुत्री उर्मिला, गुरु षतानंद आदि कन्या पक्ष विराजमान है। स्तम्भों पर संभवतः दास-दासियों की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। मंडप के पुजारी यह जानकर कि हम लोग टीकमगढ के हैं, अति उत्साहित होकर अंदर की प्रत्येक मूर्ति का विवरण बताने लगे। यहाँ अधिक दर्षनार्थी नहीं थे षायद प्रवेष षुल्क के कारण। षांत और स्वच्छ परिसर देखकर मन प्रसन्न हो गया। समयाभाव कहीं भी अधिक देर तक रुकने नहीं दे रहा था। हमें 400 कि.मी. दूर काठमाण्डू जाना था। जनकपुर में और भी दर्षनीय स्थल हैं। इसके बारे एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है- बावन कुटी, बहत्तर कुण्डा, सुर मुनि सब नावहिं मुण्डा। जनकपुर में अग्नि कुण्ड, बिहार कुण्ड, सूर्य कुण्ड, परषुराम कुण्ड आदि अनेक प्रसिद्ध कुण्ड हैं। इनके अतिरिक्त धनुष सागर, गंगा सागर, रत्न सागर, गोपाल सागर, पापद्यौत सागर, महाराज सागर, अंगराजसर, रामसर, कपालमोचिनीसर, मुरलीसर, दषरथ ताल, जनक सरोवर आदि पवित्र तालाब हैं। हल जोतते समय महाराज जनक को जिस स्थान पर सीता जी मिलीं थीं उसे ‘पुनौरा धाम’ कहा जाता है। निकट ही एक सरोवर है जिसे ‘सीता कुण्ड’ कहते हैं। यहीं पर ‘कुसुमा’ ग्राम है जहाँ  महर्षि याज्ञवल्क्य का आश्रम था। किसी समय ऋषि गौतम और कपिल मुनि के आश्रम भी यहाँ स्थापित थे। महान दार्षनिक वाचस्पति मिश्र, जिन्होंने संतानहीन होने के कारण अपने टीका ग्रंथ का नाम अपनी पत्नी के नाम पर ‘भामती’ रख दिया था, यहीं के थे। जनकपुर में श्रीराम के जन्म दिवस चैत्र सुदी नवमी (रामनवमी) जानकी जी के जन्म दिवस वैषाख सुदी नवमी (सीतानवमी) और अगहन सुदी पंचमी (श्री राम-सीता विवाहपंचमी) को यहाँ विषाल मेले भरते हैं जिनमें भारत और नेपाल के लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। इन सबको फिर कभी देखने की आकांक्षा मन में लिए हमने जिस समय काठमाण्डू के लिए प्रस्थान किया उस समय एक बज गया था।
31.10.2014ः जनकपुर से हमें आज ही रात अथवा कल सुबह तक काठमाण्डू पहुँचना था। गन्तव्य स्थल की दूरी अधिक होने से आधी रात तक पहुँचने की संभावना चालक पहले ही व्यक्त कर चुका था। नारायणगढ़ से तो पिछली रात जागते रहने के कारण रास्ते की कुछ धुँधली-सी पहचान थी पर वहाँ से काठमाण्डू का रास्ता कैसा था, यह केवल चालक, गोलू और हाँ षर्मा दम्पत्ति जो पहले भी नेपाल आ चुके हैं, जानते थे। रास्ते के दोनों तरफ घना जंगल था। यह तराई का इलाका है। साल के ऊँचे-ऊँचे पेड़ कई प्रकार की लताओं से आच्छादित। कुछ पहाड़ी हिस्सा छोड़कर इस जगह बड़ी आसानी से रेललाइन बिछाई जा सकती है पर नेपाल सरकार अभी इस तरफ ध्यान नहीें दे रही है, षायद आर्थिक और राजनीतिक स्थितियाँ इसका कारण हो सकतीं हैं। लगभग 30-40 कि.मी. चलने के बाद चालक ने बिना किसी अनुरोध के बस रोक दी। जहाँ बस रुकी थी वहाँ एक छोटा-सा मचान था जिस पर एक दुकाननुमा उजड़ी दुकान थी। अवष्य ही कभी चाय और धूम्रपान आदि सामग्री बेची जाती होगी, षायद मेलों के समय। चालक को दीर्घषंका से निवृत होना था और हमें लघुषंका से इसलिए हम सब भी नीचे उतर आए। बस के सामने खड़े होकर कुछ फोटोग्राफ्स लिए गए। चालक के लौटने पर उसके और गोलू के साथ भी फोटो लिए गए।
    बस फिर अपनी मंजिल की ओर चल पड़ी। समय बिताने के लिए एक चलित संगोष्ठी का बिचार बना। इस चलित संगोष्ठी के चलित अध्यक्ष डाॅ. दीक्षित जी के अतिरिक्त कोई अन्य हो ही नहीं सकता था क्योंकि दीक्षित जी हमारे षहर के उन दो-चार व्यक्तियों में से एक हैं जिनकी गिनती आयु, योग्यता और वरिष्ठता की दृष्टि से स्थायी अध्यक्षों के रूप में होती है। कार्यक्रम का संचालन इस यात्रा के सुप्रसिद्ध यात्री जिनसे हमारे पाठक अच्छी तरह से परिचित हो चुके हैं, ने स्वतः सँभाल लिया या ओढ़ लिया। यह एक वैसी ही संगोष्ठी थी जिसमें श्रोता कम वक्ता या कवि अधिक होते हैं। श्रोता या सोता के रूप में श्रीमती पुष्पा खरे बादल जी और रमेष जी ही उपस्थित थे। बादल जी के बारे में तो मुझे पता है कि वे काव्य गोष्ठी में पूरे समय सोते रहे थे। अस्तु, संगोष्ठी कई कि.मी. तक चली। कुछ गीत, कविताएँ और व्यंग्य तो चार-चार कि.मी. तक चलते रहे। गुप्ता जी की ‘चाबी’ कविता फरमायषी तौर पर सुनी गई। यह कविता जीवन दर्षन पर केन्द्रित एक गंभीर रचना है पर गुप्ता जी के द्वारा इसका प्रस्तुतीकरण कुछ ऐसे ड्रामाई अंदाज में किया जाता है कि सुननेवाले इसका आनंद हास्य रचना के रूप में लेते हैं। मैंने अपना बुन्देली गद्य व्यंग्य ‘चार जनै’ सुनाया। अध्यक्ष डाॅ. दीक्षित जी ने बुन्देली गीत ‘वे दिन फिरकऊँ काँ पाएँ’ सुनाया जिसमें उन्होंने बचपन और यौवन के दिनों का स्मरण करते हुए वृद्धावस्था का सटीक चित्रण किया है। गीत उनकी 76 साल की आयु के अनुरूप था। बीच की कुछ पंक्तियों से प्रदर्षित होता है कि वे उस समय रंगीन तबियत के जरूर रहे होंगे। उन्हें देखकर आज भी आसानी से कहा जा सकता है कि ‘खण्डहर बता रहे हैं कि इमारत रंगीन थी।’ (उनका डेढ़ पसली का षरीर बुलंद कहने की इजाजत नहीं देता।) चूँकि वक्ता और श्रोता एक ही सिक्के के दो पहलू थे लगता है इसीलिए सभी ने इस चलित संगोष्ठी को जरूर पानी पी-पीकर कोसा होगा। इसका प्रमाण यह है कि हम सबकी पानी की बोतलें खाली हो चुकी थीं। उन्हें भरना था सो बस एक ऐसी जगह रोकी गई जहाँ से पहाड़ी रास्ता आरंभ होनेवाला था। पहाड़ से आ रही एक पतली-सी धार से एक टंकी को भरा गया था। बगल में ही ‘चुरिया माता’ का एक छोटा-सा मंदिर था। माता को को चढ़ाई गईं चूड़ियाँ मंदिर के नाम को सार्थक कर रहीं थीं। एक रास्ता ऊपर पहाड़ी पर चला गया था। यहाँ से पानी भरा और पिया गया। चुरिया माता के दर्षन किए गए और यात्रा की सफलता की प्रार्थना की गई। जंगल की सघनता पूर्ववत थी। उसे दृष्टि से भेदना मुष्किल था। बस छोटी-बड़ी नदियों और उनपर बने लोहे के विषाल पुलों को पार करती आगे बढ़ी चली जा रही थी। एक बड़ी-सी नदी का स्मरण है षायद गंडक नदी थी। एक बड़े षहर हिन्डोल में रुककर चाय पी गई।
 रात की अधूरी नींद को पूरा करना जरूरी था। ‘देख मत छाँव कोई, टूँढ़ मत ठाँव कोई, अभी लंबा है सफर...... अभी लंबा है सफर।’ अपने इस गीत को गुनगुनाते हुए कब ऊँघने लगा और कब सो गया पता नहीं। बस जितनी तेजी से जा रही थी उससे कहीं अधिक तेजी से सूरज अस्ताचल की ओर जा रहा था। जीत सूरज की ही होनी थी, हुई भी। वह हमसे पहले अपनी मंजिल पर पहुँच गया। हम अभी रास्ते में ही थे। नारायणगढ़ पहुँचते-पहुँचते षाम हो गई थी। उसी भोजनालय के सामने से गुजरे पर पिछली रात के अनुभव को कोई नहीं दोहराना चाहता था। वैसे भूख सबको लगने लगी थी। नारायणगढ़ से हमें नए रास्ते पर जाना था। यहाँ से पहाड़ी मार्ग आरंभ हो जाता है। वैसे एक छोटा रास्ता हिन्डोल के पहले से काठमाण्डू को जाता है पर वह काफी खतरनाक और सँकरा है। सिर्फ छोटे वाहन ही जा सकते हैं। ड्राईवर होषियार और साहसी होना भी जरूरी है। हमारी बस उस रास्ते पर नहीं चल सकती थी। अब हम त्रिषूली नदी के किनारे चल रहे थे। जब मुगलिंग पहुँचे आठ बज चुके थे। मुगलिंग एक छोटा-सा कस्बा और बाजार है। नाम से लगता है कि इस जगह का संबंध मुगलों से  रहा होगा। है भी मुस्लिम बहुल बस्ती। यहाँ दो-तीन मारवाड़ी षाकाहारी होटल हैं। चालक ने अपने परिचित होटल पर बस रोक दी। मैं, गोईल जी, बादल जी, रमेष जी, दीक्षित जी और गुप्ता दम्पत्ति ने जाते ही थाली का आर्डर दे दिया। गुप्ता जी प्याज नहीं खाते हैं, उनके लिए दही और सादा दाल का ही विकल्प था। थोड़ी-सी प्रतीक्षा के बाद थाली लग गई। दो सब्जियाँ, भाजी, दाल, पापड़ और चपातियाँ। जितना खा सकें खाएँ। दाम एक सौ पचास रुपए नेपाली मुद्रा बस। खाना स्वादिष्ट था और भूख तेज, कोई सीमा नहीं पर हमारी भूख की सीमा थी सो भरपेट ही खाया गया। यहाँ भी कुछ लोगों ने नहीं खाया। वे अपने पाथेय से ही संतुष्ट थे। चालक और गोलू कहीं बगल में अपना पसंदीदा खाना खाने गए थे। यहाँ अपेक्षा से अधिक समय लग गया था। काठमाण्डू में कहाँ पहुँचना है इसकी जानकारी के लिए गोलू ने षर्मा जी से संपर्क सूत्र का मोबाइल नम्बर लिया। यहाँ गोलू का नेपाली सिमवाला फोन ही काम कर रहा था। हमारे अधिकांष फोन बंद थे। वैसे गोलू ने बताया कि एयरटेल सिम काम करती है पर उसका रोमिंग रेट बाइस रु. पर मिनट है। गोलू ने काफी कोषिषों के बाद संपर्क होने पर उस स्थान की जानकारी पता की जहाँ हमें रुकना था। अंततः हमने अपने मुख्य गन्तव्य की ओर प्रस्थान किया। दस बज चुके थे। यहाँ से काठमाण्डू सौ-सवा सौ कि.मी. रह गया था पर रात का समय और पहाड़ी मार्ग होने से तीन-चार घंटे लगने सहज थे। सड़क खराब नहीं तो अच्छी भी नहीं थी। कुछ कि.मी. ही चले होंगे कि नींद आ गई। आँख खुली तो देखा कि काठमाण्डू आ चुका था। रास्ते पूरी तरह से सुनसान थे। किसी देष की राजधानी में इतनी खामोषी की अपेक्षा कम से कम मैंने तो नहीं की थी। बस काठमाण्डू के पुराने हिस्से से गुजर रही थी। थोड़ी देर में ही बस एक जगह रुक गई। गोलू ने संपर्क सूत्र को फोन लगाया ताकि उस जगह की सही स्थिति पता कर सके जहाँ हमें ठहरना था। दो-तीन प्रयास के बाद भी संपर्क न हो सकने पर गोलू और मैं नीचे उतरे। बगल में एक नदी बह रही थी। मेरा अनुमान था कि वह बागमती नदी होगी। उस पर एक सँकरा-सा पुल बना था। नदी के दूसरे तट पर एक मंदिर दिख रहा था। यह नेपाल में सुप्रसिद्ध गुह्येष्वरी देवी का मंदिर था। गोलू पुल पर बैठे एक आदमी को देखकर उसके पास गया। जब वह लौटकर आया तो मैंने पूछा- कुछ पता चला ? गोलू ने बताया कि वह आदमी पूरी तरह टुन्न है।  उसने फिर फोन लगाया, इस बार बात हो गई और उन्होंने एक पता बताया। हमें किसी श्री कृष्ण मंदिर पहुँचना था। मुझे आगे मोड़ पर एक मकान में लाइट जलती दिख रही थी। कोई सरकारी कार्यालय था। मै गोलू के साथ वहाँ गया और आवाज दी तो एक व्यक्ति बाहर निकला। पी तो उसने भी रखी थी पर बात करने लायक होष था। उसने गोलू को रास्ते के बारे में समझाया। हम बस के पास लौटे तभी एक गाड़ी जिसमें सैनिक थे, आकर वहाँ रुकी। उन्होने हमारी बस और हमपर एक दृष्टि डाली और बिना कुछ कहे-सुने जैसे आए थे वैसे ही चले गए। उनकी इस कृपादृष्टि पर मुझे सुखद आष्चर्य हुआ। भारत में तो पुलिस या सैनिक इस तरह आसानी से जाने और छोड़नेवाले नहीं थे। उस व्यक्ति के बताए रास्ते पर हम आगे बढ़े। लगभग चार कि.मी. चलकर बागमती पर बने एक पुल को पार कर नदी के दूसरे तट पर पहँुचे। पास ही एक पहाड़ी पर मंदिर के षिखर पर जलते बल्ब से लग रहा था कि हम सही जगह आ चुके थे। मंदिर को लक्ष्य बनाकर दो-तीन मोड़ मुड़कर जब हम पहाड़ी के निकट पहुँचे तो पहाड़ी पर जानेवाली सड़क पर लगे स्वागत द्वार और कार्यक्रम के बैनर को देखकर हमने संतोष की साँस ली। अभी साँस बाहर भी न आ पाई थी कि बसचालक ने बस ऊपर ले जाने की बजाय बगल में रोक दी। हम सबने खूब कहा, बूढ़े और महिलाओं को सामान सहित ऊपर जाने में परेषानी की लाख दुहाई दी पर वह यही रट लगाए रहा कि बस गेट से नहीं निकल पाएगी। मैं गुप्ता जी के साथ ऊपर गया। वहाँ पर देखा कि वह सारा परिसर श्री कृष्ण प्रणामी समाज मंदिर का है और न केवल रुकने की बल्कि कार्यक्रम के आयोजन की सारी व्यवस्था भी वहीं की गई है। वहाँ तैनात गार्ड ने मंदिर के व्यवस्थापक को बुलवा दिया उन्होंने बताया कि आप सब आ जाएँ। मैंने चालक द्वारा बस ऊपर न ले आने की बात बताई तो वे युवा सज्जन मेरे साथ नीचे आए और चालक को बताया कि बस आसानी से ऊपर गईं हैं पर उस जिद्दी चालक जिसे अब चालाक कहना अधिक ठीक होगा, ने साफ मना कर दिया। आखिरकार सबने सामान उठाया और ऊपर चल पड़े। कुछ लोगों ने अधिकांष सामान बस में ही छोड़ दिया।  मैंने एक और आखिरी कोषिष की और एक वहीं पड़े रस्सी के टुकड़े से गेट और बस की चैड़ाई भी नापकर यह सिद्ध कर दिया कि गेट बस से दो फुट चैड़ा है पर उसने इस प्रामाणिक जानकारी को भी मानने से साफ इंकार कर दिया। इस नापतौल का फल यह निकला कि मेरा नज़र का चष्मा कहीं झुकते समय गिर गया और षेष नेपाल यात्रा वगैर चष्मे के ही पूरी हुई। मेरे पहुँचने तक अधिकांष लोग एक बड़े-से हाॅल में पड़े गद्दों को अधिकृत कर चुके थे। मैं दूसरी जगह तलाषकर आया तो बादल जी ने बताया कि उन्हें एक कमरा मिल गया है मैं गोईल जी के साथ वहीं आ जाऊँ। मैं कमरे में पहुँचा तो देखा, वहाँ श्री सत्यनारायण जी विराजमान हैं। मैंने उनसे निवेदन किया कि वे सपत्नीक हैं।  इस कमरे में तीन पलंग हैं और बादलजी, गोईल जी और मेरे ठहरने का निष्चय हो चुका है अतः उचित होगा कि वे डबलबैडवाले किसी कमरे का इंतजाम करलें पर वे टस से मस नहीं हुए। मैंने सारा किस्सा बाहर आकर बादल जी को सुनाया तो उन्होने जरा साफ-साफ अंदाज में उनसे जाने को कह दिया। अंततः हम तीनों ने बिस्तर की षरण ली और सो गए। हमेषा की तरह बादल जी जल्दी उठ गए और नहा-धोकर तैयार हो गए। मेरी नींद खुली ही थी कि एक अन्तेवासी एक बालिका के साथ थरमस में चाय लिए कमरे आए और ‘प्रणाम’ कहा। हमने भी प्रणाम कहा। बाद में पता चला कि प्रणामी समाज में अभिवादन का यही ढंग है। चाय पीकर         
nepal yatra

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

vaid भारतीय सन्दर्भ मे....

वेद........भारतीय सन्दर्भ

धरती पर सभी ज्ञान का स्त्रोत वेद ही है। ये मौखिक रुप से एक पीढी से दूसरी पीढियो तक पृथ्वी मे विचरित है वेद चार है ऋग्वेद जिसमे मुख्य रुप से स्तुतिया है यजुर्वेद जिसमे यज्ञो की विधिया का वर्णन है सामवेद मे गीतो की चर्चा है और अर्थवेद मे बहुत सारे जादू टोने है ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ है इसमे रहस्य से चमत्कृत करने वाले मंत्रो का उदगार है इसमे प्रकृति का सुरम्य वर्णन है तथा यह जीवन के रहस्य को उजागर करता है इसमे देवताओ विशेषत इन्द्र की स्तुतिया भी हुयी है ऋग्वेद का ध्येय देवताओ जैसा बनना है जीवात्मा परमात्मा बन सकती है ऋग्वेद मे परमात्मा की तुलना एक बढर्इ या लुहार से की गयी है जो जगत को गढता है या ढालता है
     यजुर्वेद का अर्थ गध है वेदकालीन लोगो का विश्वास था कि जगत का पूर्णतया नियंत्रण यज्ञ करता है वैदिक कालीन समाज यज्ञो से देवताओ को प्रसन्न करता था ताकि वे प्रजा पर सुख समृद्धि की वृषिटपात कर सके यज्ञ से पर्यावरण की शुद्धि होती है यज्ञ की उध्र्वगति होने के कारण इससे उठने वाला धूम जितनी उपर उठती जायेगी वायुमंडल उतना ही प्रवाहित होता जायेगा अगिन पृथ्वी की गंदी तथा हानिकारक वस्तुओ को जलाती है
    सामवेद का अर्थ है सुंदर सुखकर आनंददायक वचन संगीत को सर्वाधिक सुखकर और आंनददायक माना गया है इनका उदगार स्वर ताल बद्ध वाणी द्धारा गार देवी देवताओ को प्रसन्न करता है
    अर्थवेद मे दानवी शकितयो के लिए प्रार्थनाए है जो हमारे जीवन मे व्याधि और विपतित लाती है कौटिल्य के अर्थशास्त्र का स्रोत यही है यह चिकित्सा विज्ञान का आरम्भ ग्रंथ है मातृभूमि की स्तुति मे गाया गया इसका पृथ्वी सूक्त अत्यन्त प्रसिद्ध है
         कहा गया है कि मातृभमि के प्रति अनुपम निष्ठा और प्रेम का उदाहरण विश्व साहित्य मे उपलब्ध नही है ऋग्वेद का आखिरी सूक्त भी हमारी पृथ्वी पर बसुधैव कुटुम्बकम की भावना से एक होकर सुखपूर्वक रहने की कामना करता है तथा सन्देश देता है ।
                                                                         

एक कविता ..... प्रश्न

पश्न सारे अनुत्तरीत हुए उत्तर की तलाश मे ।
जवानी चल बसी आशाओ की आस मे ।।
सजा तो आइ आकर कट गइ ।
दाग लगे रहे धुलने की आस मे ।।
जुर्म का सजा से विवाद हो गया ।
फैशन का तामीज से निकाह हो गया ।।
तालीम ढूढती है खुशियो को राह मे ।
आज सजा होती है गरीबो की सास मे ।।
क्यो आखो से अब अश्क नही बहते ।
क्यो दामन मे अब फूल नही खिलते ।।
क्या आदमी बंजर हो गया ।
जीवन की तलाश मे ।।

                            vijay mehra tikamgarh

सोमवार, 5 नवंबर 2012

आजादी के मायने..............एक कविता
            आजादी के मायने समझ मे आते है।
                       हसंते हसंते निहत्ते कत्ल किये जाते है।।
            संभल कर चलना आजादी है।
                       अधिकरो पर अतिक्रमण भी हो जाते है।।
           गैरो पर भरोसा रखना अपनो से ज्यादा।
                       अपने अक्सर ही मुसीबतो मे दूर जाते है।।
           डर डर के रहना तू अपने आशियाने मे।
                       कभी कभी दिन मे भी ताले तोडे जाते है।।
           न दिल लगाना कभी किसी मुफलिस से।
                       यहा सिर्फ किताबो मे दिल पडे जाते है।।
           सुखी न होना कभी खुशी से ।
                        ये शुभ अवसर खा जाते है।।
           वो हंसते हंसते आते है।
                        कितनो को रुला के जाते।।
                                                                         विजय कुमार मेहरा

sarkari tark...... ek vyang

                  सरकारी तर्क......................एक व्यंग्य

  इयक्सूा मी यहा क्या हो रहा है। पत्रकार ने पूछा बाबू जी बोले यहा पुराने पेडो को काटकर मैदान बनाया जा रहा है ताकी कल मंत्री महोदय यहा पर वृक्षारोपण कर सके। किंतु हरे भरे पेडो को काटना कहा की बुद्वधिमत्ता है तुम्हारा मतलब वृक्षारोपण करना बुद्वधिमत्ता नही है। अरे भार्इ विकास को धरातल पर लाने के लिए पुराने को शहीद तो होना ही पडता है। और फिर हमे रिकार्ड दर्शाना है की कितनी भूमी पर वृक्षारोपण किया गया न कि कितनी भूमी पर पेडो को काटा गया। पुराने पेड लावारिस होते है अवव्यवस्था ज्यादा फैलाते है और देते केवल फल है नये पौधे लगाने पर उस पर नाम लिखा जाता है उसके लिए खाद पानी रक्षा आदी का बजट बनाया जाता है जो पास भी हो जाता है अरे भाई पुराने पेड तो ऐतिहासिक भी होते उनसे आपकी यादे जुडी होती है। वह प्रत्यक्ष तो केवल फल देते है किंतु अप्रत्यक्ष बहुत कुछ देते है। भाई क्या देते है क्या लेते है मुझे नही पता मुझे तो उपर से आदेश मिला है जिसका पालन करवा रहा हू।
       मंत्री जी जहा आप वृक्षारोपण करेगे वहा पहले से ही वृक्ष लगे है और उन्हे काटा जा रहा है क्यो क्योकि बडे वृक्ष छोटो को पनपने नही देते इसीलिए। वहा वृक्षारोपण क्यो नही किया जाता जहा वृक्ष हो ही न। जहा वृक्ष है ही नही वहा वृक्ष हो भी नही सकते समझे। पत्रकार के सारे तर्क कुतर्क की श्रेणी मे आ गये ।
        मंत्री जी बोले वृक्षो को लगाने से लेकर उसके बडे होने तक का समय सरकार का होता है वृक्षो को पालना पोषना उनकी देखभाल करना सब सरकारी नितियो द्वारा ही होता है। पेड बडा होने पर बेलगाम और हो जाता है और उसे पालने की आवश्यकता नही होती और न ही पोषण की उपर से उसकी रक्षा भी करनी पडती कि कही कोइ काट कर न ले जाए बजट भी यही कहता है अप्रत्यक्ष लाभ मिल रहा हो तो प्रयास करे प्रत्यक्ष लाभ मिल सके
       छह माह बाद वृक्षारोपण स्थल पर पिजंरे मे बंद वृक्ष अपनी जिंदगी के आखरी दिन गिन रहे थे और पिंजरे पर तख्ती मे लिखे नामो से पूछ रहे थे हमसे क्या भूल हुइ जो ऐ सजा हमको मिली....
                                                                                 विजय कुमार मेहरा