बुन्देलखण्ड की मीराबाई: महारानी कमलकुंवरि ‘जुगल प्रिया’
-अभिनंदन गोइल
छतरपुर नरेश महाराजा विश्वनाथ सिंह जी (सन् 1867-1932) की ज्येष्ठ महारानी श्रीमती कमलकुमारी देवी उर्फ कमल कुँवरि ओरछेश महाराजा प्रताप सिंह जू देव (1874-1930) जो धर्मक्षेत्र में योगिराज महर्षि के नाम से जाने जाते थे की सुपुत्रीं थीं। कमल कुँवरि की साध्वी स्वरूप माता महारानी वृषभान कुँवरि थी, जिनकी प्रेरणा से ही अयोध्या में कनक भवन और नेपाल के जनकपुर में श्री राम-जानकी मंदिर का निर्माण कराया गया था। सुसंस्कार, त्याग और तप की दीक्षा कमल कुँवरि को अपने धर्म परायण माता-पिता से ही प्राप्त हुई थी।
प्रसिद्ध मनीषि और साहित्यकार श्री वियोगी हरि जी श्रीमती कमल कुमारी देवी को अपनी धर्म माता मानते थे। उन्होंने स्वीकारा है कि ‘‘उनके (कमल कुँवरि के) पवित्र वात्सल्य ने ही जीवन के अंधेरे मरू-देश में भटक जाने से मुझे बचाया था।’’.....................’’ पति के साथ उनका सांसारिक सम्बंध नहीं बना। जीवन भर विरागनी ही रहीं। सत्संग, धर्मग्रन्थों का पारायण ही जीवन क्रम रहा। सत्संग करते-करते धर्मतत्व का खासा ज्ञान भी इन्हें हो गया था। सैकड़ों श्लोक और पद कण्ठाग्र थे। चारों बैष्णव संप्रदायों से तो निकट का सम्बंध था ही, शैव सम्प्रदाय का भी अच्छा ज्ञान था। राम, कृष्ण और शिव तीनों ही उनके उपास्य देव थे।’’
महारानी कमल कुमारी का जीवनक्रम तपस्यामय था। बड़ी दृढ़ता के साथ वे दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिन के कठिन उपवास करती थीं। बीमार होने पर भी कभी उन्होंने अपने व्रतों को खण्डित नहीं किया। सत्संग, शास्त्रों का पठन-पाठन उपवास के दिनों में भी ज्यों का त्यों चलता रहा। जिस प्रकार मीराबाई की तपःसाधना में विघ्न-बाधायें आई उसी तरह महारानी कमलकुमारी जी की साधना में भी आई और उन्होंने बड़ी बड़ी यंत्रणायें भी झेली परन्तु सभी क्लेशों को हंसते-हंसते सहन किया। मीराबाई की ही भांति इनकी भी धर्मश्रद्धा पीड़ायें सहकर और अधिक उज्जवल होती गईं।
श्री वियोनी हरि ने अपनी इन धर्ममाता के साथ अनेक तीर्थ यात्रायें की थीं। जिनकी बड़े ही भावनात्मक और मार्मिक संस्मरण उनके आलेख ‘‘एक पुण्य कथा’’ में वर्णित है। इसी संदर्भ से एक मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूँ।
वे ब्रह्म गिरि की कठिन यात्रा पर गईं। महारानी होने के बाबजूद भी वे रेल के तीसरे दर्जे में ही यात्रा करती थी, और पैदल भी खूब चलती थी। जेठ का महीना था। पर्वत की शिलायें मानो आग उगल रहीं थीं। उनका एकादशी का निर्जला व्रत था। पूजा-पाठ से निवृत हो वे दोपहर 12 बजे नंगे पैर पर्वत की प्रदक्षिणा के लिये चल दी। वृद्धा नौकरानी ने भी अनुकरण किया पर थोड़ी दूर पर ही उसके पैरों ने जबाब दे दिया। करुणामयी कमल कुँवरि ने अपनी साड़ी की धज्जियाँ फाड़ चीरकर नौकरानी के पैरों पर लपेट दी और स्वयं नंगे पैरों ही पवित्र ब्रह्म गिरि की ढाई कोस की प्रदक्षिणा उस तपती दोपहर में राम-राम जपते हुये, बिना विश्राम किये पूरी की।
नाथ द्वारा की यात्रा में बुखार पीड़ित अचेत नौकरानी के पैर दवाकर सेवा की। नौकरानी बेचारी को कुछ भी पता नहीं चलने दिया। आश्चर्यचकित वियोगी हरि से धीरे से बोलीं- ‘‘बेटा, यह कोई बड़ी बात नहीं है। इस गरीबनी ने तो मेरी बरसों सेवा की है। यह बुढ़िया तो मेरी माँ समान है। मंदिर मैं आज इसलिये नहीं गई कि सेवा का यह पुण्यफल वहाँ कहाँ मिलता। यह भी तो श्रीनाथ जी की ही आराधना है।’’
लगता है उनके हृदय की करूणा ही विगलित होकर उनके काव्य में ढल गई हो। ‘‘जुगल प्रिया’’ उपनाम से उन्होंने बृजभाषा में बहुत ही सुन्दर पद रचे थे, जिनका संग्रह श्री वियोगी हरि ने ‘‘जुगलप्रिया-पदावली’’ के नाम से प्रकाशित कराया था। उसका एक पद यहाँ उद्धत है-
नाथ अनाथन की सब जानें।
ठाड़ी द्वार पुकार करत हों,
स्रवन सुनत नहिं, कहा रिसानै ?
की वहु खोटि जान जिय मेरी,
की कछु स्वारथ हित अरगानै ?
दीनबन्धु मनसा के दाता-
गुन औगुन कैधों मन आने ?
आप एक हम पतित अनेकन,
यही देखि का मन सकुचानै ?
झूठोहि अपनौ नाम धरायौ,
समझि रहे हैं ‘‘हमहिं सयानै’’
तजो टेक मन मोहन मेरे,
‘‘जुगलप्रिया’’ दीजै रस दानै।
श्री रामनरेश त्रिपाठी ने रानी कमलकुँवरि कृत पद्य वद्ध ‘‘तुलसी दास का जीवन चरित्र’’’ प्रकाशित किया था, जो अब अप्राप्त है।
मीराबाई से साम्य स्थापित करने वाला उनका एक पद प्रस्तुत है-
धरी राजसी दूरि भक्ति रस रंग विकासिनी।
करि कठोर पत रमति तीरथनि तेज प्रकाशनी।।
चढ़ि खांडे की धार विमुख जन गति मति लोपी।
संतन हरि अधिक मानि वैष्णव ध्वज रोपी।।
श्री ब्रज राजेश्वरी कृपा बल श्रुति दुर्लभ आनंद पगी।
‘जुगल प्रिया’ मीरा सदृश युगलरूप रूचि रस संगी।
अंत में श्री वियोगी हरि जी के शब्दों से ही अपनी बात का उपसंहार करता हूँ-
‘‘मेरी धर्ममाता की साधना, सत्यनिष्ठा, सेवा-परायणता और भक्ति भावना इतनी ऊँची थी कि उनकी गणना निःसन्देह पुराकाल के भागवतों में की जा सकती है। मैंने तो उन्हें मीराबाई का अवतार माना और ऐसा करके मैंने कोई अत्युक्ति नहीं की।’’
संदर्भ ग्रंथ-
1. ओरछेश स्मृतिग्रन्थ, स्व.श्री बनारसीदास चतुर्वेदी
2. बुन्देलखण्ड की कवियात्रियाँ, स्व.श्री हरिविष्णु अवस्थी
अभिनंदन गोइल
अध्यक्ष
अखिल भारतीय बुन्देलखण्ड साहित्य
एवं संस्कृति परिषद्
जिला इकाई टीकमगढ़ (म.प्र.)
मोबा. 9424923622
bundelkhand ki mirabai
-अभिनंदन गोइल
छतरपुर नरेश महाराजा विश्वनाथ सिंह जी (सन् 1867-1932) की ज्येष्ठ महारानी श्रीमती कमलकुमारी देवी उर्फ कमल कुँवरि ओरछेश महाराजा प्रताप सिंह जू देव (1874-1930) जो धर्मक्षेत्र में योगिराज महर्षि के नाम से जाने जाते थे की सुपुत्रीं थीं। कमल कुँवरि की साध्वी स्वरूप माता महारानी वृषभान कुँवरि थी, जिनकी प्रेरणा से ही अयोध्या में कनक भवन और नेपाल के जनकपुर में श्री राम-जानकी मंदिर का निर्माण कराया गया था। सुसंस्कार, त्याग और तप की दीक्षा कमल कुँवरि को अपने धर्म परायण माता-पिता से ही प्राप्त हुई थी।
प्रसिद्ध मनीषि और साहित्यकार श्री वियोगी हरि जी श्रीमती कमल कुमारी देवी को अपनी धर्म माता मानते थे। उन्होंने स्वीकारा है कि ‘‘उनके (कमल कुँवरि के) पवित्र वात्सल्य ने ही जीवन के अंधेरे मरू-देश में भटक जाने से मुझे बचाया था।’’.....................’’ पति के साथ उनका सांसारिक सम्बंध नहीं बना। जीवन भर विरागनी ही रहीं। सत्संग, धर्मग्रन्थों का पारायण ही जीवन क्रम रहा। सत्संग करते-करते धर्मतत्व का खासा ज्ञान भी इन्हें हो गया था। सैकड़ों श्लोक और पद कण्ठाग्र थे। चारों बैष्णव संप्रदायों से तो निकट का सम्बंध था ही, शैव सम्प्रदाय का भी अच्छा ज्ञान था। राम, कृष्ण और शिव तीनों ही उनके उपास्य देव थे।’’
महारानी कमल कुमारी का जीवनक्रम तपस्यामय था। बड़ी दृढ़ता के साथ वे दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिन के कठिन उपवास करती थीं। बीमार होने पर भी कभी उन्होंने अपने व्रतों को खण्डित नहीं किया। सत्संग, शास्त्रों का पठन-पाठन उपवास के दिनों में भी ज्यों का त्यों चलता रहा। जिस प्रकार मीराबाई की तपःसाधना में विघ्न-बाधायें आई उसी तरह महारानी कमलकुमारी जी की साधना में भी आई और उन्होंने बड़ी बड़ी यंत्रणायें भी झेली परन्तु सभी क्लेशों को हंसते-हंसते सहन किया। मीराबाई की ही भांति इनकी भी धर्मश्रद्धा पीड़ायें सहकर और अधिक उज्जवल होती गईं।
श्री वियोनी हरि ने अपनी इन धर्ममाता के साथ अनेक तीर्थ यात्रायें की थीं। जिनकी बड़े ही भावनात्मक और मार्मिक संस्मरण उनके आलेख ‘‘एक पुण्य कथा’’ में वर्णित है। इसी संदर्भ से एक मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूँ।
वे ब्रह्म गिरि की कठिन यात्रा पर गईं। महारानी होने के बाबजूद भी वे रेल के तीसरे दर्जे में ही यात्रा करती थी, और पैदल भी खूब चलती थी। जेठ का महीना था। पर्वत की शिलायें मानो आग उगल रहीं थीं। उनका एकादशी का निर्जला व्रत था। पूजा-पाठ से निवृत हो वे दोपहर 12 बजे नंगे पैर पर्वत की प्रदक्षिणा के लिये चल दी। वृद्धा नौकरानी ने भी अनुकरण किया पर थोड़ी दूर पर ही उसके पैरों ने जबाब दे दिया। करुणामयी कमल कुँवरि ने अपनी साड़ी की धज्जियाँ फाड़ चीरकर नौकरानी के पैरों पर लपेट दी और स्वयं नंगे पैरों ही पवित्र ब्रह्म गिरि की ढाई कोस की प्रदक्षिणा उस तपती दोपहर में राम-राम जपते हुये, बिना विश्राम किये पूरी की।
नाथ द्वारा की यात्रा में बुखार पीड़ित अचेत नौकरानी के पैर दवाकर सेवा की। नौकरानी बेचारी को कुछ भी पता नहीं चलने दिया। आश्चर्यचकित वियोगी हरि से धीरे से बोलीं- ‘‘बेटा, यह कोई बड़ी बात नहीं है। इस गरीबनी ने तो मेरी बरसों सेवा की है। यह बुढ़िया तो मेरी माँ समान है। मंदिर मैं आज इसलिये नहीं गई कि सेवा का यह पुण्यफल वहाँ कहाँ मिलता। यह भी तो श्रीनाथ जी की ही आराधना है।’’
लगता है उनके हृदय की करूणा ही विगलित होकर उनके काव्य में ढल गई हो। ‘‘जुगल प्रिया’’ उपनाम से उन्होंने बृजभाषा में बहुत ही सुन्दर पद रचे थे, जिनका संग्रह श्री वियोगी हरि ने ‘‘जुगलप्रिया-पदावली’’ के नाम से प्रकाशित कराया था। उसका एक पद यहाँ उद्धत है-
नाथ अनाथन की सब जानें।
ठाड़ी द्वार पुकार करत हों,
स्रवन सुनत नहिं, कहा रिसानै ?
की वहु खोटि जान जिय मेरी,
की कछु स्वारथ हित अरगानै ?
दीनबन्धु मनसा के दाता-
गुन औगुन कैधों मन आने ?
आप एक हम पतित अनेकन,
यही देखि का मन सकुचानै ?
झूठोहि अपनौ नाम धरायौ,
समझि रहे हैं ‘‘हमहिं सयानै’’
तजो टेक मन मोहन मेरे,
‘‘जुगलप्रिया’’ दीजै रस दानै।
श्री रामनरेश त्रिपाठी ने रानी कमलकुँवरि कृत पद्य वद्ध ‘‘तुलसी दास का जीवन चरित्र’’’ प्रकाशित किया था, जो अब अप्राप्त है।
मीराबाई से साम्य स्थापित करने वाला उनका एक पद प्रस्तुत है-
धरी राजसी दूरि भक्ति रस रंग विकासिनी।
करि कठोर पत रमति तीरथनि तेज प्रकाशनी।।
चढ़ि खांडे की धार विमुख जन गति मति लोपी।
संतन हरि अधिक मानि वैष्णव ध्वज रोपी।।
श्री ब्रज राजेश्वरी कृपा बल श्रुति दुर्लभ आनंद पगी।
‘जुगल प्रिया’ मीरा सदृश युगलरूप रूचि रस संगी।
अंत में श्री वियोगी हरि जी के शब्दों से ही अपनी बात का उपसंहार करता हूँ-
‘‘मेरी धर्ममाता की साधना, सत्यनिष्ठा, सेवा-परायणता और भक्ति भावना इतनी ऊँची थी कि उनकी गणना निःसन्देह पुराकाल के भागवतों में की जा सकती है। मैंने तो उन्हें मीराबाई का अवतार माना और ऐसा करके मैंने कोई अत्युक्ति नहीं की।’’
संदर्भ ग्रंथ-
1. ओरछेश स्मृतिग्रन्थ, स्व.श्री बनारसीदास चतुर्वेदी
2. बुन्देलखण्ड की कवियात्रियाँ, स्व.श्री हरिविष्णु अवस्थी
अभिनंदन गोइल
अध्यक्ष
अखिल भारतीय बुन्देलखण्ड साहित्य
एवं संस्कृति परिषद्
जिला इकाई टीकमगढ़ (म.प्र.)
मोबा. 9424923622
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